Home Blog Page 11

आगरा में चांदी कारीगर के घर डकैती, गृहस्वामी को बंधक बनाकर 27 KG चांदी लूटी

0

एत्माद्दौला के नगला छिदामी में डकैती की सनसनीखेज वारदात हुई। बदमाशों ने चांदी कारीगर के घर को निशाना बनाया। गृहस्वामी को तमंचा और बंदूक के दम पर बंधक बनाकर वारदात को अंजाम दिया। बदमाश घर से 27 किलो चांदी चोरी कर ले गए। पुलिस वारदात की जांच में जुटी है।

बेटा आगरा चेन फैक्ट्री में कारीगर है

गृहस्वामी राधेश्याम ने बताया कि उनका बेटा आगरा चेन फैक्ट्री में कारीगर है। वह माल लेकर मकान की दूसरी मंजिल पर भी स्वजन के साथ चांदी की चेन आदि सामान बनाता है। शुक्रवार रात हथियारबंद दो बदमाश छत के जाल की सरिया काटकर घर में दाखिल हुए। इस पर राधेश्याम जाग गए। बदमाशों ने उनके चारपाई पर ही दबोच लिया। तमंचा व बंदूक के दम पर बंधक बना लिया। इसके बाद घर का दरवाजा खोल दया। इससे अन्य बदमाश भी घर में दाखिल हो गए।

दो बदमाश राधेश्याम को बंधक बनाए रखे

दो बदमाश राधेश्याम को बंधक बनाए रहे। वहीं अन्य बदमाश घर की ऊपरी मंजिल पर चले गए और डकैती की वारदात को अंजाम दिया। उन्होंने बताया कि साढ़े 23 किलो चांदी फैक्ट्री की और करीब चार किलो चांदी घर की रखी हुई थी, जिले बदमाश लूट ले गए।

बदमाशाें के जाने के बाद पीड़ित ने मचाया शाेर

बदमाशों के जाने पर पीड़ित ने शोर मचाया, तब घर में सो रहे लोगों को वारदात की जानकारी हुई। पीड़ित के अनुसार बदमाशों की संख्या छह थी। पीड़ित की सूचना पर एत्माद्दौला पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच की।

इंस्पेक्टर देवेंद्र कुमार दुबे ने बतया कि जांच की जा रही है। आसपास के सीसीटीवी फुटेज भी चेक किए जा रहे हैं। जल्द ही वारदात का पर्दाफाश किया जाएगा।

अब आपकी चलेगी मर्जी: प्रीपेड स्मार्ट मीटर की अनिवार्यता खत्म, DVVNL के लाखाें उपभाेक्ताओं के लिए राहत की खबर

0

दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (डीवीवीएनएल) के उपभोक्ताओं के लिए राहत भरी खबर है। स्मार्ट मीटर लगेगा, लेकिन वह प्रीपेड होगा या फिर पोस्टपेड, यह उपभोक्ता ही तय करेगा।

उनपर व्यवस्था को थोपा नहीं जाएगा। स्मार्ट मीटरों को लेकर हो रहे विरोध के बाद केंद्र सरकार ने यह निर्णय लिया है। इसके बाद उपभोक्ताओं ने राहत की सांस ली है।

स्मार्ट प्रीपेड मीटर के लिए, उपभोक्ता की सहमति लेना होगा जरूरी

जिले में डीवीवीएनएल के लगभग पांच लाख उपभोक्ता हैं। डेढ लाख से अधिक के यहां पर स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं। उन्हें प्रीपेड में बदला जा चुका है। इसका उपभोक्ता विरोध कर रहे हैं। रीचार्ज कराए जाने के दो दिन बाद तक बिजली सप्लाई शुरू न हो पाने के उपभोक्ताओं ने आरोप लगाए हैं।

उपभोक्ता नहीं चाहते प्रीपेड मीटर, रीचार्ज कराने के बाद भी सपय पर नहीं मिलती बिजली

केके नगर के मुरारीलाल ने बताया कि रीचार्ज कराए जाने के बाद भी समय पर बिजली नहीं मिल पाती है। उन्होंने कहा कि हर वक्त जेब में पैसा होना भी आवश्यक नहीं है। पोस्टपेड व्यवस्था बेहतर है। पीपी नगर के सचिन ने बताया कि बिना जानकारी दिए ही पोस्टपेड से प्रीपेड कर दिया गया है।

उपभाेक्ता स्मार्ट मीटर लगवाने के लिए तैयार नहीं हैं

स्मार्ट प्रीपेड मीटरों को लेकर आ रही समस्याओं को देखते हुए उपभोक्ता अब स्मार्ट मीटर लगवाए जाने के लिए तैयार नहीं हैं। विरोध होने लगा है। हाल ही में निर्णय हुआ है कि स्मार्ट मीटर तो लगेगा, लेकिन वह पोस्टपेड होगा या फिर प्रीपेड यह निर्णय उपभोक्ता का होगा। बिना उपभोक्ता की मर्जी के स्मार्ट मीटर लगाना संभव नहीं होगा। डीवीवीएनएल के मुख्य अभियंता कपिल सिंधवानी का कहना है कि नियमानुसार कार्य किया जाएगा।

आयरनमाउस ने ट्रैम्पोलिन वीडियो पर दी प्रतिक्रिया, CVID बीमारी पर बढ़ाई जागरूकता

0

 वीट्यूबर आयरनमाउस ने एक ऑनलाइन वायरल वीडियो पर रिएक्ट किया है। इस वीडियो में उन्हें और सीडॉग को ट्रैम्पोलिन पर साथ नाचते दिखाया गया था। क्लिप में देखा जा सकता है कि सीडॉगवीए एक आईपैड थामे हुए हैं, जिसमें आयरनमाउस का कैरेक्टर था, जबकि वे ट्रैम्पोलिन पर कूद रहे थे।

हालांकि, कुछ ऑनलाइन दर्शकों ने स्थिति को समझे बिना क्लिप का मजाक उड़ाया। आयरनमाउस ने बाद में एक्स पर जवाब दिया, अपनी स्वास्थ्य स्थिति की व्याख्या की और बताया कि यह पल उनके लिए क्यों बहुत मायने रखता था। उन्होंने इस ध्यान का इस्तेमाल प्राइमरी इम्यून डिफिशिएंसी और सीवीआईडी के बारे में लोगों को शिक्षित करने के लिए भी किया।

वायरल क्लिप में सीडॉगवीए ने आयरनमाउस के साथ समय बिताने का एक रचनात्मक तरीका अपनाया था। उन्होंने उसके वर्चुअल अवतार को ट्रैम्पोलिन पर कूदते हुए साथ लिया। कई प्रशंसकों ने इस पल का आनंद लिया और इसे दोस्तों के बीच एक दयालु इशारे के रूप में देखा।

आयरनमाउस कॉमन वैरिएबल इम्यून डिफिशिएंसी (सीवीआईडी) नामक गंभीर स्वास्थ्य स्थिति से पीड़ित हैं, जो इम्यून सिस्टम को प्रभावित करती है। इस वजह से वे ज्यादातर घर पर रहती हैं और अक्सर बाहर स्वतंत्र रूप से नहीं जा पातीं। ट्रैम्पोलिन वाला यह पल उन दुर्लभ मौकों में से एक था, जिसमें वे टेक्नोलॉजी और दोस्तों की मदद से आउटडोर गतिविधि का अनुभव कर सकीं।

वीडियो वायरल होने के बाद कुछ लोगों ने ऑनलाइन नकारात्मक टिप्पणियां कीं। यही वजह थी कि आयरनमाउस को जवाब देना पड़ा और उन्होंने समझाया कि लोगों को फैसला करने से पहले उनकी स्थिति को समझना चाहिए।

CVID और इम्यून डिफिशिएंसी जागरूकता के बारे में क्यों की बात

आयरनमाउस ने बताया कि वे आमतौर पर आलोचना का जवाब नहीं देतीं, लेकिन इस बार उन्हें लगा कि यह जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्राइमरी इम्यून डिफिशिएंसी से पीड़ित कई लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकल पाते या सामान्य दैनिक जीवन भी नहीं जी पाते।

उन्होंने यह भी साझा किया कि वे खुद को भाग्यशाली मानती हैं क्योंकि उनके पास एक सहयोगी कम्युनिटी और दोस्त हैं, जो उन्हें रचनात्मक तरीकों से गतिविधियों में शामिल करते हैं। उनके अनुसार, ट्रैम्पोलिन वाला पल क्रिंज नहीं था, बल्कि कुछ बहुत अर्थपूर्ण था, जिसने उन्हें घर के बाहर के जीवन में शामिल महसूस कराया।

Champions League: पीएसजी और एटलेटिको ने सेमीफाइनल में किया प्रवेश, बार्सिलोना जीत के बावजूद हुआ बाहर

0

 चैंपियंस लीग में मंगलवार रात जीत के बावजूद बार्सिलोना सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सकी। एटलेटिको मैड्रिड से उसके घर पर खेल रही बार्सिलोना ने क्वार्टर फाइनल के दूसरे लेग में 2-1 से जीत दर्ज की।

एटलेटिको ने पहला लेग 2-0 से जीता था और इस तरह वह 3-2 के कुल अंतर के साथ सेमीफाइनल में पहुंचने में सफल रहा। वहीं, दूसरे क्वार्टर फाइनल में मौजूदा चैंपियन पेरिस सेंट जर्मेन (पीएसजी) ने लिवरपूल को 2-0 से हराया और कुल 4-0 के अंतर से अंतिम चार में जगह बनाई। पहले लेग में भी पीएसजी ने 2-0 की जीत दर्ज की थी।

नौ साल बाद अंतिम चार में एटलेटिको

बार्सिलोना के शुरुआती हमलों के बावजूद एटलेटिको मैड्रिड की टीम ने डटकर मुकाबला किया और लगभग एक दशक में पहली बार चैंपियंस लीग के सेमीफाइनल में प्रवेश किया। उसने इससे पहले 2017 में इस प्रतियोगिता के सेमीफाइनल में जगह बनाई थी।

बार्सिलोना ने पहले 24 मिनट में दो गोल करके स्कोर बराबर कर दिया था। उसकी तरफ से लामिने यमाल और फेरान टोरेस ने गोल दागे। एटलेटिको मैड्रिड ने पहले ही हाफ में अडेमोला लुकमैन के गोल से वापसी की।

बार्सिलोना को 79वें मिनट के बाद 10 खिलाड़‍ियों के साथ खेलना पड़ा क्योंकि डिफेंडर एरिक गार्सिया को लाल कार्ड दिखाया गया था।

लिवरपूल की उम्‍मीदों पर फिरा पानी

वहीं, लिवरपूल में खेले गए क्वार्टर फाइनल के एक अन्य मैच में पीएसजी ने ओस्मान डेंबेले के दूसरे हाफ में किए गए दो गोल की मदद से 4-0 की कुल जीत सुनिश्चित की। डेंबले के पहले गोल ने लिवरपूल की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, क्योंकि प्रीमियर लीग का यह क्लब चैंपियंस लीग में एक और यादगार वापसी की तलाश में था।

बैलन डी ओर विजेता डेंबले ने गोलकीपर जियोर्गी मामारदाश्विली को छकाते हुए बाएं पैर से शानदार शॉट लगाया, जिससे घरेलू दर्शक सन्न रह गए। उन्होंने दूसरा गोल स्टापेज टाइम में किया।

‘परिसीमन बिल रोकने के लिए INDIA गठबंधन को बनानी होगी एकजुट रणनीति’, दिल्ली बैठक से पहले सीएम उमर ने दिया बयान

0

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बुधवार को कहा कि प्रस्तावित परिसीमन संंबंधी संसदीय विधेयक पर आईएनडीआईए (INDIA) एलायंस को सामूहिक रूप से अपनी रणनीति को तय करना चाहिए। अगर वह परिसीमन विधेयक पर सत्ताधारी दल के इरादों को विफल बनाना चाहता है तो गठबंधन में शामिल सभी दलों का एकजुट होना जरुरी है।

आज यहां पत्रकारों के साथ बातचीत में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर हमारा अनुभव कोई बेहतर नहीं रहा है। पहले यहां जो जम्मू-कश्मीर में परिसीमन किया गया या देश में कहीं हुआ, वह पूरी तरह से भाजपा और उसके सहयोगी दलों को राजनीतिक लाभ पहुंचाने के लिए किया गया परिसीमन रहा है।

उन्होंने परिसीमन और महिला आरक्षण संबंधी संसदीय बिलों के संदर्भ में आईएनडीआईए अलायंस की दिल्ली में होने वाली बैठक मेंभागलने की पुष्टि करते हुए कहा कि गठबंधन को तय करना होगा कि उसकी परिसीमन संबंधी बिल पर उसकी प्रतिक्रिया-उसकी रणनीति क्या होगी, संसद में वह किस तरह की भूमिका निभाएगा। आईएनडीआईए एलायंस की बैठक कांग्रेस  अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर आयोजित होगी, जहां विपक्ष प्रस्तावित विधेयक पर संयुक्त रणनीति तैयार कर सकता है।

INDIA गठबंधन तय करे संसद में भूमिका

उमर अब्दुल्ला ने कहा कि अलग-अलग पार्टियों द्वारा अकेले कार्रवाई करना प्रभावी नहीं होगा। गठबंधन के भीतर सामूहिक निर्णय लेने की आवश्यकता है।” जम्मू-कश्मीर में हुए परिसीमन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सीटों का वितरण, निर्वाचन क्षेत्रों का गठन, नक्शों का निर्माण और मतदाताओं का स्थानांतरण—इन सबका उद्देश्य केवल यह था कि किसी तरह भाजपा और उसके सहयोगियों को लाभ मिले।

उन्होंने आगे कहा कि संसदीय संरचना में प्रस्तावित बदलाव, जिनमें लोकसभा सदस्यों की संख्या में वृद्धि और महिलाओं के प्रतिनिधित्व के प्रावधान शामिल हैं, का विपक्षी गठबंधन द्वारा सामूहिक रूप से अध्ययन किया जाएगा।

परिसीमन बिल की आहट से जम्मू-कश्मीर में सियासी सरगर्मियां तेज, संसद में सीटें बढ़ने से केंद्र की नीतियों पर असर तय

0

 संसद में गुरूवार को पेश किए जाने वाले परिसीमन बिल को लेकर जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक हल्को में हलचल तेज हो गई है। इस बिल के आधार पर होने वाला परिसीमन जम्मू कश्मीर में राजनीतिक परिदृश्य और ताकत बदल सकता है।

यह न सिर्फ स्थानीय बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करेगा और यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने बिल के पारित होने और परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही इसे लेकर अपनी आशंकाएं जताना शुरु कर दी है।

प्रस्तावित बिल के आधार पर होने वाले परिसीमन के आधार पर जम्मू-कश्मीर देश के अन्य केंद्र शसित प्रदेशों में शामिल हो सकता है, जिन्हें लोकसभा सीटों के संदर्भ में सबसे ज्यादा लाभ होगा। एक अनुमान के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की मौजूदा पांच संसदीय सीटों की संख्या बढ़कर आठ हो सकती है।

प्रस्तावित परिसीमन बिल के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेशों के कोटे में संसदीय सीटों को 19 से बढ़ाकर 35 किया जाना है। हालांकि प्रस्तावित परिसीमन में जम्मू कश्मीर में विधानसभा सीटें भी बढ़ेंगी,लेकिन उनकी संख्या पर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हैं।

संसदीय परिसीमन बिल को लेकर जारी है चर्चा

कश्मीर मामलों के जानकार फैयाज ने कहा कि बीते दो-तीन दिनों से कश्मीर में सभी लोग संसदीय परिसीमन बिल को लेकर चर्चा कर रहे हैं,उससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि सभी इसकी अहमियत को समझरहे हैं। उन्होंने कहा कि संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़ने का मतलब स्थानीय लोग अब पहले से ज्यादा बेहतर समझते हैं।

उन्होंने कहा वर्ष 2024 के संसदीय चुनावाें में हमने महसूस किया था कि आम कश्मीरी जो कुछ वर्ष पहले तक संसदीय चुनावों को ज्यादा अहमियत नहीं देता था, संसदीय चुनावों को लेकर गंभीर है। आम मतदाता समझ चुका है कि उसके भाग्य का अंतिम निर्णय जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में नहीं संसद में होता है, इसलिए वहां अच्छे प्रतिनिधि चाहिए, उनकी संख्या और प्रभाव ऐसा होना चाहिए कि वह उसके मुद्दों पर केंद्र सरकार को प्रभावित कर सकें। इसलिए यहां कई हलकों में संसदीय सीटें बढ़ाए जाने की भी मांग हा रही है। अब देखना यह है कि यह परिसीमन कब और किस तरीके से होता है।

परिसीमन होता है तो जम्मू प्रांत को होगा लाभ

संवैधानिक मामलों के जानकार एडवोकेट अंकुर शर्मा ने कहा कि मानकों के आधार पर अगर परिसीमन होता है तो जम्मू प्रांत को लाभ होगा ।जम्मू प्रांत की भौगोलिक-सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अलावा आप आबादी को भी ध्यान में रखें। और जिन तीन सीटों के बढ़ने की उम्मीद है,उनमें से कम से कम दो जम्मू प्रांत में ही बढ़नी चाहिए। मेरे मुताबिक, जम्मू कश्मीर में कम से कम सात सीटें बढ़नी चाहिए थी जो अब कहा जा रह है तीन ही बढ़ेंगी। खैर,अभी बिल आना है,परिसीमन होना है।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हों या पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती या फिर कश्मीर केंद्रित किसी अन्यराजनीतिक दल के नेता, सभी परिसीमन तो चाहते हैं कि लेकिन वह इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर आशंकित हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि परिसीमन होना चाहिए, हम इससे इंकार नहीं करते, लेकिन अभी तीन चार वर्ष पहले जम्मू कश्मीर में जो परिसीमन हुआ है, वह कई मामलों में तर्कहीन और पक्षपातपूर्ण नजर आता है।

भाजपा-सहयोगी दलों को होगा लाभ

वह सिर्फ भाजपा और उसके सहयागी दलों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया एक परिसीमन है। उसका जम्मू-कश्मीर की जनता को क्या लाभ हुआ? अब पूरे देश में भाजपा को लाभ पहुंचाने का प्रयास हो सकता है। महबूबा मुफ्ती ने कहा कि परिसीमन अपरिहार्य है, लेकिन यह उस तरह से नहं होना चाहिए, जैसा हमने जम्मू-कश्मीर में अभी कुछ वर्ष पहले देखा है।

राजौरी-पुंछ को अनंतनाग से जोड़ दिया,जम्मू में विधानसभा सीटें बढ़ा दी गई और कश्मीर की उपेक्षा हुई। आप किसी दल कोलाभ् पहुंचान के लिए करेंगे तो सही नहींहै। इसलिए केंद्र सरकार कोपहले पूरी तरह स्थिति स्पष्टकरनी चाहिए,यहां राजनीतिक कारणों से परिसीमन हो रहा है। कश्मीर मामलों के जानकार आसिफ कुरैशी ने कहा कि लोगों को अच्छी तरह से पता चल चुका है जम्मू-कश्मीर की असली राजनीतिक ताकत उसकी विधानसभा में नहीं, बल्कि संसद में उसके प्रतिनिधित्व में निहित है।

संसद में जम्मू-कश्मीर का प्रभाव बढ़ना चाहिए

यदि लोकसभा सीटें बढ़ती हैं, जिनके बारे में कल तक कहा जा रहा था कि सात बढ़ेगी, अब सुना है कि तीन चार ही बढ़ेगी, तो क्षेत्र की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका और प्रभाव काफी बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर का आम नागरिक चाहता है कि संसद में जम्मू-कश्मीर का प्रभाव बढ़ना चाहिए, क्योंकि उसके पास पांच अगस्त 2019 का अनुभव है।

संसद में एक-एक वोट कीमती होता है और जिसे याद न हो, वह 1998 में नेशनल कान्फ्रेसं के तत्कालीन लोकसभा सदस्य सैफुद्दीन सोज को याद कर सकता है, जिन्होंने पार्टी विहिप का उल्लंघन कर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ अविश्वासमत प्रस्ताव के समर्थन में वोट डाला और सरकार गिरा दी थी।

खैर, इस समय सभी की नजरें नेशनल कान्फ्रेंस पर टिकी हैं, वह इस बिल का समर्थन करती है या इसके खिलाफ खड़ी होती है। संसद में वह क्या रवैया अपनाएगी, यह दिलचस्प रहेगा।

क्या आप जानते हैं बिरसा मुंडा की असली कहानी? जिसने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया

0

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे नायक हैं, जिनके योगदान को लंबे समय तक उतनी पहचान नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी। ऐसे ही एक महान जननायक थे बिरसा मुंडा, जिन्हें आदिवासी समाज आज भी “धरती आबा” (धरती के पिता) के नाम से सम्मान देता है। उनका जीवन केवल अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अस्मिता की रक्षा का इतिहास भी है।

15 नवंबर 1875 को वर्तमान झारखंड के उलिहातू गांव में जन्मे बिरसा मुंडा मुंडा जनजाति से थे। उस समय छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजी शासन और जमींदारी व्यवस्था के कारण आदिवासी समुदाय अपनी पारंपरिक जमीनों से बेदखल हो रहा था। जंगलों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ रहा था और आदिवासियों से उनके पारंपरिक अधिकार छीने जा रहे थे। ऐसे माहौल में बिरसा का बचपन बीता।

उन्होंने कुछ समय तक मिशनरी स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। ईसाई मिशनरियों के संपर्क में आने के बाद उन्होंने शिक्षा हासिल की, लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि आदिवासी समाज अपनी परंपराओं, संस्कृति और पहचान से दूर होता जा रहा है। इसके बाद उन्होंने अपने समाज को जागरूक करने का अभियान शुरू किया।

बिरसा मुंडा केवल राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि एक सामाजिक और धार्मिक सुधारक भी थे। उन्होंने आदिवासी समाज से अंधविश्वास, नशाखोरी और सामाजिक कुरीतियों को छोड़ने का आह्वान किया। वे स्वच्छता, अनुशासन और सामुदायिक एकता पर जोर देते थे। उनके अनुयायियों ने उन्हें आध्यात्मिक नेता के रूप में भी स्वीकार किया।

उनका सबसे बड़ा संघर्ष अंग्रेजों की उस व्यवस्था के खिलाफ था, जिसने आदिवासियों की जमीन बाहरी जमींदारों और साहूकारों के हाथों में पहुंचा दी थी। बिरसा का मानना था कि जंगल और जमीन पर पहला अधिकार उन लोगों का है, जो पीढ़ियों से वहां रहते आए हैं।

1899-1900 के दौरान उन्होंने “उलगुलान” (महाविद्रोह) का नेतृत्व किया। यह केवल एक विद्रोह नहीं था, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई थी। हजारों आदिवासी उनके नेतृत्व में अंग्रेजी शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ खड़े हुए। इस आंदोलन ने ब्रिटिश प्रशासन को हिला दिया।

हालांकि अंग्रेजों के पास आधुनिक हथियार थे और अंततः उन्होंने इस विद्रोह को दबा दिया। 3 फरवरी 1900 को बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें रांची जेल में रखा गया, जहां 9 जून 1900 को मात्र 25 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। ब्रिटिश सरकार ने उनकी मृत्यु का कारण हैजा बताया, लेकिन उस समय भी उनकी मृत्यु को लेकर कई सवाल उठे और आज भी इस विषय पर अलग-अलग चर्चाएं होती हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर उनकी मृत्यु का आधिकारिक कारण वही माना जाता है, जबकि अन्य दावों के निर्णायक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

हालांकि बिरसा मुंडा का जीवन बहुत छोटा था, लेकिन उनका आंदोलन व्यर्थ नहीं गया। उनके संघर्ष के बाद ब्रिटिश सरकार को छोटानागपुर क्षेत्र में भूमि संबंधी कानूनों पर पुनर्विचार करना पड़ा। बाद में ऐसे कानूनी प्रावधान बने, जिनका उद्देश्य आदिवासियों की जमीन को बाहरी लोगों के हाथों में जाने से रोकना था।

आज बिरसा मुंडा केवल झारखंड या आदिवासी समाज के नायक नहीं हैं, बल्कि पूरे भारत में सामाजिक न्याय, समानता और अधिकारों के प्रतीक माने जाते हैं। उनके सम्मान में अनेक विश्वविद्यालय, संस्थान, संग्रहालय और हवाई अड्डे स्थापित किए गए हैं। भारत सरकार ने उनके जन्मदिन 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की, ताकि देश उनके योगदान को याद रख सके।

बिरसा मुंडा के बारे में समय-समय पर कई तरह के दावे किए जाते हैं। कुछ लोग उन्हें केवल धार्मिक नेता बताते हैं, जबकि कुछ उन्हें केवल स्वतंत्रता सेनानी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में उनका व्यक्तित्व इन दोनों सीमाओं से कहीं बड़ा था। वे सामाजिक सुधारक, आदिवासी अधिकारों के रक्षक, आध्यात्मिक प्रेरणास्रोत और औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ संघर्ष करने वाले जननायक थे।

उनकी विरासत हमें यह सिखाती है कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, भाषा, परंपराओं और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी होती है। बिरसा मुंडा ने इन्हीं मूल्यों की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया। इसलिए उन्हें केवल इतिहास की एक घटना के रूप में नहीं, बल्कि न्याय, स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई के प्रतीक के रूप में याद किया जाना चाहिए।

बिरसा मुंडा की सच्ची छवि किसी एक राजनीतिक विचारधारा या सीमित व्याख्या में नहीं समाती। इतिहास के उपलब्ध और विश्वसनीय स्रोत उन्हें एक ऐसे युवा नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसने अपने लोगों के अधिकारों, सम्मान और अस्तित्व की रक्षा के लिए अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है, और यही कारण है कि वे आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।

फैक्ट चेक: क्या अमेरिका से BAN होकर भारत आए डेटा सेंटर्स? जानिए जॉर्जिया वॉटर विवाद का सच

0

XMT न्यूज डेस्क | नई दिल्ली
सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक खबर तेजी से वायरल हो रही है। इसमें दावा किया जा रहा है कि अमेरिका के जॉर्जिया राज्य में ‘ब्लैकस्टोन’ (Blackstone) कंपनी के एक डेटा सेंटर ने करोड़ों गैलन पानी चोरी-छिपे इस्तेमाल किया, जिसके बाद वहां की सरकार ने उस पर बैन (BAN) लगा दिया। इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि अब वही कंपनी ‘गूगल’ के नाम से भारत आकर यहां का पानी खत्म कर रही है।
XMT न्यूज की फैक्ट चेक टीम ने जब इस खबर की पड़ताल की, तो सच्चाई कुछ और ही निकलकर सामने आई। आइए जानते हैं इस वायरल दावे का असली सच।
1. जॉर्जिया (USA) में क्या हुआ था?
* दावा: डेटा सेंटर ने करोड़ों गैलन पानी चोरी किया।
* सच: अमेरिका के जॉर्जिया (फेयेट काउंटी) में QTS नाम का एक बड़ा डेटा सेंटर कैंपस है, जिसमें ब्लैकस्टोन का पैसा लगा हुआ है। इस डेटा सेंटर ने लगभग 3 करोड़ गैलन (30 मिलियन गैलन) पानी इस्तेमाल किया था, जो बिलिंग मीटर में दर्ज नहीं हो पाया था।
इस वजह से आसपास के इलाकों में पानी का प्रेशर कम हो गया। पड़ताल के बाद कंपनी ने इस अनबिल्ड पानी का लगभग $1,50,000 (लगभग 1.25 करोड़ रुपये) का बिल और जुर्माना भरा।
2. क्या जॉर्जिया सरकार ने कंपनी को BAN कर दिया?
* दावा: सरकार ने कंपनी पर बैन लगाकर उसे देश से निकाल दिया।
* सच: यह दावा बिल्कुल गलत है। कंपनी को बैन नहीं किया गया था। हालांकि, इस घटना के बाद स्थानीय लोगों के विरोध को देखते हुए वहां की लोकल सिटी काउंसिल ने नए डेटा सेंटर्स के निर्माण पर अस्थाई रोक (Moratorium) लगाई है। पुरानी कंपनी पर कोई बैन नहीं लगा है।
3. क्या ब्लैकस्टोन ‘गूगल’ के नाम से भारत आई है?
* दावा: कंपनी अब गूगल के नाम पर भारत आकर पानी का इस्तेमाल कर रही है।
* सच: यह दावा पूरी तरह भ्रामक है।
* गूगल और ब्लैकस्टोन अलग-अलग हैं: गूगल एक मल्टीनेशनल टेक कंपनी है, जबकि ब्लैकस्टोन एक ग्लोबल इन्वेस्टमेंट फर्म है। दोनों पूरी तरह से अलग कंपनियां हैं।
* भारत में डेटा सेंटर्स क्यों बन रहे हैं? भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल सेवाओं की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। इस वजह से गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, ब्लैकस्टोन और अडाणी जैसी बड़ी कंपनियां भारत में हजारों करोड़ रुपये का निवेश करके अपने-अपने डेटा सेंटर्स बना रही हैं। यह किसी बैन की वजह से नहीं हो रहा है।
📊 फैक्ट चेक समरी (Fact Check Summary)
* जॉर्जिया में 3 करोड़ गैलन पानी इस्तेमाल हुआ? — सच (मीटर की खराबी के कारण बिना बिल का पानी इस्तेमाल हुआ था)
* जॉर्जिया सरकार ने कंपनी को बैन किया? — गलत (कंपनी ने बिल और जुर्माना भरा, बैन नहीं हुई)
* ब्लैकस्टोन गूगल के नाम से भारत आई? — गलत (दोनों बिल्कुल अलग-अलग कंपनियां हैं)
* डेटा सेंटर्स में बहुत पानी लगता है? — सच (सर्वर को ठंडा रखने के लिए लिक्विड-कूलिंग में लाखों लीटर पानी लगता है)
💡 निष्कर्ष (Conclusion)
वायरल हो रही पोस्ट में आधे सच और आधी अफवाह को मिलाकर पेश किया गया है। जॉर्जिया में पानी की समस्या जरूर आई थी, लेकिन कंपनी बैन नहीं हुई। साथ ही भारत में बन रहे डेटा सेंटर्स यहां के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और AI की मांग के कारण बन रहे हैं।
XMT न्यूज वर्डिक्ट: वायरल दावा भ्रामक (Misleading) है।

जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक को लेकर प्रदर्शन जारी, कॉकरोच जनता पार्टी के साथ कलाकार भी उतरे समर्थन में

0

नई दिल्ली | 21 जुलाई 2026

देशभर में कथित NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों का गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में मंगलवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हजारों छात्र, युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और कई कलाकार एकत्र हुए। प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि NEET जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा में हुई कथित अनियमितताओं ने लाखों छात्रों के भविष्य को दांव पर लगा दिया है। उनका आरोप है कि बार-बार पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों के कारण मेहनत करने वाले छात्रों का भरोसा व्यवस्था से उठता जा रहा है।

इससे पहले संसद की ओर मार्च करने की कोशिश के दौरान प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बन गई थी। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका। इस दौरान धक्का-मुक्की और झड़प की घटनाएं भी सामने आईं। इसके बाद प्रदर्शनकारी दोबारा जंतर-मंतर पहुंच गए और वहीं शांतिपूर्ण धरना जारी रखने का फैसला किया।

प्रदर्शन को बॉलीवुड और कला जगत से भी समर्थन मिला। वरिष्ठ अभिनेत्री शबाना आज़मी ने जंतर-मंतर पहुंचकर छात्रों के आंदोलन का समर्थन किया। वहीं अभिनेता रितेश देशमुख और अभिनेत्री जेनेलिया देशमुख समेत कई अन्य कलाकारों ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से छात्रों के पक्ष में अपनी आवाज उठाई। कई कलाकारों ने परीक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शी जांच की मांग की।

कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं का कहना है कि उनका आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहेगा और जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रहेगा। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में कथित पेपर लीक की निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार और छात्रों के हितों की सुरक्षा शामिल है।

फिलहाल जंतर-मंतर पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है। छात्रों का कहना है कि उनका संघर्ष किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए है।

(नोट: यह मामला अभी जांच और राजनीतिक बहस का विषय है। प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए आरोप उनके दावे हैं। जांच एजेंसियों और सरकार की आधिकारिक कार्रवाई के बाद ही अंतिम निष्कर्ष सामने आएंगे।)

विशेष खोजी रिपोर्ट: ‘आत्मदाह की थ्योरी’ बनाम तकनीकी हकीकत; मेरठ थप्पड़ कांड में पुलिस दावों और मैनुअल पर उठे बड़े सवाल

0

मेरठ।

ललिता गौतम हत्याकांड को लेकर कलेक्ट्रेट पर हुआ बवाल अब महकमे की कार्यशैली पर एक बड़ा तकनीकी और कानूनी सवाल बन चुका है। पुलिस वैन (बंदी वाहन) के भीतर युवक रवि गौतम को मेरठ के तत्कालीन आला अधिकारी द्वारा थप्पड़ मारे जाने का वीडियो और “सड़क तुम्हारे बाप की नहीं है” जैसी भाषा शैली ने ‘खाकी’ की संवेदनशीलता को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।

इस ग्राउंड रिपोर्ट में हम उन मुख्य तकनीकी और प्रशासनिक झोल का विश्लेषण कर रहे हैं, जो इस पूरे मामले को संदिग्ध बनाते हैं:

1. बंदी वाहन की तकनीकी बनावट: क्या आगरा के ‘जगदीशपुरा कांड’ जैसी थ्योरी दोहराई जा रही है?

प्रशासन का दावा है कि हिरासत में लिया गया युवक रवि गौतम बंदी वाहन के अंदर आत्महत्या (फंदा लगाने) की कोशिश कर रहा था, जिसे रोकने के लिए तुरंत बल प्रयोग (थप्पड़) करना पड़ा।

 तकनीकी हकीकत और बनावट: उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मानक ‘टाटा 407’ या ‘महिंद्रा’ चेसिस पर बने बंदी वाहनों (Prison Vans) के अंदरूनी हिस्से की कुल ऊंचाई (Interior Roof Height) फर्श से छत तक अधिकतम 4.8 फीट से 5.2 फीट के बीच होती है। गाड़ी के अंदर दोनों तरफ कैदियों के बैठने के लिए बेंच लगी होती हैं। ऐसे में एक 5.5 फीट लंबे सामान्य व्यक्ति के लिए इस वैन के अंदर सीधा खड़ा होना भी नामुमकिन है। कस्टडी में लेने से पहले पुलिस नियमानुसार बेल्ट, रस्सी या गमछा जैसी चीजें जब्त कर लेती है।

 आगरा के जगदीशपुरा मामले से तुलना: पुलिस की यह दलील उत्तर प्रदेश पुलिस के इतिहास के उस कुख्यात मामले की याद दिलाती है, जब आगरा के जगदीशपुरा थाने के मालखाने से चोरी के आरोप में पकड़े गए अरुण वाल्मीकि की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई थी। तब पुलिस के आला अधिकारियों ने आधिकारिक बयान दिया था कि ‘एक लगभग 5.5 फीट के लड़के ने बाथरूम में जमीन से महज 2.5 फीट की ऊंचाई पर लगी पानी की टोंटी (नल) से बेल्ट बांधकर फांसी लगा ली।’ उस समय भी इस हास्यास्पद और तकनीकी रूप से असंभव दावे पर पूरे देश में यूपी पुलिस की थू-थू हुई थी। ठीक वैसी ही असंभव थ्योरी अब मेरठ पुलिस बंदी वाहन के भीतर ‘फंदा लगाने’ को लेकर दे रही है। बंद गाड़ी के भीतर, जहां दर्जनों अन्य लोग और पुलिसकर्मी मौजूद हों, वहां कोई व्यक्ति तकनीकी रूप से फंदा कैसे लगा सकता है? यह साफ तौर पर कैमरे पर कैद हुई प्रशासनिक बर्बरता को छिपाने का एक कमज़ोर बहाना नज़र आता है।

2. पुलिस मैनुअल और मर्यादा का उल्लंघन: कानून की कौन सी किताब देती है इजाजत?

घटना के दौरान अधिकारी का कथित बयान “यह सड़क तुम्हारे बाप की नहीं है” और गाड़ी के भीतर हाथ डालकर युवक पर सीधे थप्पड़ बरसाना, पुलिस की ट्रेनिंग और उनकी कार्यप्रणाली पर गहरा सवाल उठाता है।

 क्या कहता है पुलिस मैनुअल? उत्तर प्रदेश पुलिस रेगुलेशन (UP Police Regulation) और ‘क्राउड कंट्रोल’ (भीड़ नियंत्रण) गाइडलाइंस के मुताबिक, पुलिस को किसी भी उग्र परिस्थिति में न्यूनतम बल (Minimum Force) का प्रयोग करना होता है। इसमें चरणबद्ध तरीके से—पहले लाउडस्पीकर से चेतावनी, फिर वॉटर कैनन, आंसू गैस और बेहद जरूरी होने पर लाठीचार्ज का नियम है।

 लेकिन, जो व्यक्ति पहले से ही हिरासत में लिया जा चुका है और पुलिस की गाड़ी के भीतर बंद (यानी पूरी तरह प्रशासन के नियंत्रण में) है, उस पर ‘थप्पड़’ मारना या शारीरिक हमला करना पुलिस मैनुअल और मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है। पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है, न कि सड़क पर खुद ‘जज’ बनकर किसी नागरिक को सजा सुनाना।

3. संवादहीनता का आरोप: क्या पीड़ित परिवार से बात करना ज़रूरी नहीं समझा?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ी विफलता प्रशासनिक संवादहीनता (Communication Gap) की रही। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब कोई पीड़ित परिवार कलेक्ट्रेट जैसी जगह पर अपनी बेटी की हत्या के खिलाफ न्याय की गुहार लगाने आता है, तो जिले के आला अधिकारियों (DM/SSP) की यह जिम्मेदारी होती है कि वे खुद या अपने किसी वरिष्ठ प्रतिनिधि (जैसे ADM या SP) को भेजकर उनसे शांतिपूर्वक वार्ता करें।

 पीड़ित पक्ष का दावा: परिवार का कहना है कि पुलिस प्रशासन ने उनकी बात सुनने और जांच का ठोस आश्वासन देने के बजाय, उन्हें ‘बाहरी तत्व’ और ‘उपद्रवी’ घोषित कर दिया। अगर समय रहते पीड़ित परिवार के साथ बैठकर संवेदनशीलता से बात की गई होती, तो न तो कलेक्ट्रेट पर लाठीचार्ज की नौबत आती और न ही खाकी को इस तरह सरेआम नागरिक अधिकारों को तार-तार करना पड़ता।

निष्कर्ष: ‘पहचान’ देखकर कार्रवाई के आरोप

इस पूरे घटनाक्रम ने जनता के मन में यह सवाल गहरा कर दिया है कि क्या पुलिस का रवैया प्रदर्शनकारियों की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि देखकर तय होता है? पीड़ित समाज का सीधा आरोप है कि अगर यही प्रदर्शन किसी रसूखदार या सत्ताधारी दल से जुड़े संगठन का होता, तो क्या अधिकारी इसी तरह गाड़ी में घुसकर थप्पड़ मारने की हिम्मत दिखाते या वहां हाथ जोड़कर बातचीत का रास्ता निकाला जाता? ललिता गौतम को न्याय दिलाने की यह लड़ाई अब पुलिसिया कार्यशैली बनाम नागरिक गरिमा की जंग बन चुकी है।