परिसीमन बिल की आहट से जम्मू-कश्मीर में सियासी सरगर्मियां तेज, संसद में सीटें बढ़ने से केंद्र की नीतियों पर असर तय

 संसद में गुरूवार को पेश किए जाने वाले परिसीमन बिल को लेकर जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक हल्को में हलचल तेज हो गई है। इस बिल के आधार पर होने वाला परिसीमन जम्मू कश्मीर में राजनीतिक परिदृश्य और ताकत बदल सकता है।

यह न सिर्फ स्थानीय बल्कि राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित करेगा और यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने बिल के पारित होने और परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही इसे लेकर अपनी आशंकाएं जताना शुरु कर दी है।

प्रस्तावित बिल के आधार पर होने वाले परिसीमन के आधार पर जम्मू-कश्मीर देश के अन्य केंद्र शसित प्रदेशों में शामिल हो सकता है, जिन्हें लोकसभा सीटों के संदर्भ में सबसे ज्यादा लाभ होगा। एक अनुमान के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की मौजूदा पांच संसदीय सीटों की संख्या बढ़कर आठ हो सकती है।

प्रस्तावित परिसीमन बिल के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेशों के कोटे में संसदीय सीटों को 19 से बढ़ाकर 35 किया जाना है। हालांकि प्रस्तावित परिसीमन में जम्मू कश्मीर में विधानसभा सीटें भी बढ़ेंगी,लेकिन उनकी संख्या पर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हैं।

संसदीय परिसीमन बिल को लेकर जारी है चर्चा

कश्मीर मामलों के जानकार फैयाज ने कहा कि बीते दो-तीन दिनों से कश्मीर में सभी लोग संसदीय परिसीमन बिल को लेकर चर्चा कर रहे हैं,उससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि सभी इसकी अहमियत को समझरहे हैं। उन्होंने कहा कि संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़ने का मतलब स्थानीय लोग अब पहले से ज्यादा बेहतर समझते हैं।

उन्होंने कहा वर्ष 2024 के संसदीय चुनावाें में हमने महसूस किया था कि आम कश्मीरी जो कुछ वर्ष पहले तक संसदीय चुनावों को ज्यादा अहमियत नहीं देता था, संसदीय चुनावों को लेकर गंभीर है। आम मतदाता समझ चुका है कि उसके भाग्य का अंतिम निर्णय जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में नहीं संसद में होता है, इसलिए वहां अच्छे प्रतिनिधि चाहिए, उनकी संख्या और प्रभाव ऐसा होना चाहिए कि वह उसके मुद्दों पर केंद्र सरकार को प्रभावित कर सकें। इसलिए यहां कई हलकों में संसदीय सीटें बढ़ाए जाने की भी मांग हा रही है। अब देखना यह है कि यह परिसीमन कब और किस तरीके से होता है।

परिसीमन होता है तो जम्मू प्रांत को होगा लाभ

संवैधानिक मामलों के जानकार एडवोकेट अंकुर शर्मा ने कहा कि मानकों के आधार पर अगर परिसीमन होता है तो जम्मू प्रांत को लाभ होगा ।जम्मू प्रांत की भौगोलिक-सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के अलावा आप आबादी को भी ध्यान में रखें। और जिन तीन सीटों के बढ़ने की उम्मीद है,उनमें से कम से कम दो जम्मू प्रांत में ही बढ़नी चाहिए। मेरे मुताबिक, जम्मू कश्मीर में कम से कम सात सीटें बढ़नी चाहिए थी जो अब कहा जा रह है तीन ही बढ़ेंगी। खैर,अभी बिल आना है,परिसीमन होना है।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हों या पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती या फिर कश्मीर केंद्रित किसी अन्यराजनीतिक दल के नेता, सभी परिसीमन तो चाहते हैं कि लेकिन वह इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर आशंकित हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि परिसीमन होना चाहिए, हम इससे इंकार नहीं करते, लेकिन अभी तीन चार वर्ष पहले जम्मू कश्मीर में जो परिसीमन हुआ है, वह कई मामलों में तर्कहीन और पक्षपातपूर्ण नजर आता है।

भाजपा-सहयोगी दलों को होगा लाभ

वह सिर्फ भाजपा और उसके सहयागी दलों को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया एक परिसीमन है। उसका जम्मू-कश्मीर की जनता को क्या लाभ हुआ? अब पूरे देश में भाजपा को लाभ पहुंचाने का प्रयास हो सकता है। महबूबा मुफ्ती ने कहा कि परिसीमन अपरिहार्य है, लेकिन यह उस तरह से नहं होना चाहिए, जैसा हमने जम्मू-कश्मीर में अभी कुछ वर्ष पहले देखा है।

राजौरी-पुंछ को अनंतनाग से जोड़ दिया,जम्मू में विधानसभा सीटें बढ़ा दी गई और कश्मीर की उपेक्षा हुई। आप किसी दल कोलाभ् पहुंचान के लिए करेंगे तो सही नहींहै। इसलिए केंद्र सरकार कोपहले पूरी तरह स्थिति स्पष्टकरनी चाहिए,यहां राजनीतिक कारणों से परिसीमन हो रहा है। कश्मीर मामलों के जानकार आसिफ कुरैशी ने कहा कि लोगों को अच्छी तरह से पता चल चुका है जम्मू-कश्मीर की असली राजनीतिक ताकत उसकी विधानसभा में नहीं, बल्कि संसद में उसके प्रतिनिधित्व में निहित है।

संसद में जम्मू-कश्मीर का प्रभाव बढ़ना चाहिए

यदि लोकसभा सीटें बढ़ती हैं, जिनके बारे में कल तक कहा जा रहा था कि सात बढ़ेगी, अब सुना है कि तीन चार ही बढ़ेगी, तो क्षेत्र की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका और प्रभाव काफी बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर का आम नागरिक चाहता है कि संसद में जम्मू-कश्मीर का प्रभाव बढ़ना चाहिए, क्योंकि उसके पास पांच अगस्त 2019 का अनुभव है।

संसद में एक-एक वोट कीमती होता है और जिसे याद न हो, वह 1998 में नेशनल कान्फ्रेसं के तत्कालीन लोकसभा सदस्य सैफुद्दीन सोज को याद कर सकता है, जिन्होंने पार्टी विहिप का उल्लंघन कर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ अविश्वासमत प्रस्ताव के समर्थन में वोट डाला और सरकार गिरा दी थी।

खैर, इस समय सभी की नजरें नेशनल कान्फ्रेंस पर टिकी हैं, वह इस बिल का समर्थन करती है या इसके खिलाफ खड़ी होती है। संसद में वह क्या रवैया अपनाएगी, यह दिलचस्प रहेगा।

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