क्या आपने कभी गौर किया है कि घर में छोटे बच्चे और बुजुर्ग सबसे जल्दी बीमार क्यों पड़ते हैं, जबकि नौजवानों पर मौसम या बीमारियों का असर आसानी से नहीं होता?
इसका जवाब हमारे शरीर के ‘सुरक्षा चक्र’ यानी हमारी इम्युनिटी में छिपा है। हम अक्सर यह मान लेते हैं कि शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत जीवन भर एक जैसी रहती है, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है।
दिल्ली के सरिता विहार स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. एस. चटर्जी का कहना है कि शरीर के बाकी हिस्सों की तरह ही हमारी इम्युनिटी भी उम्र के साथ बदलती है। यह बचपन में बेहद नाजुक होती है, जवानी में सबसे मजबूत हो जाती है और उम्र ढलने के साथ धीरे-धीरे अपना दम तोड़ने लगती है।
बचपन से जवानी तक का सफर
जन्म के समय एक शिशु का शरीर बीमारियों और कीटाणुओं से पूरी तरह अनजान होता है। इस वजह से शुरुआती सालों में बच्चे बहुत जल्दी बीमार पड़ते हैं। यहीं पर टीकाकरण एक ढाल बनकर सामने आता है। टीके हमारे शरीर को बिना बीमार किए ही उन कीटाणुओं से लड़ना सिखा देते हैं, जो भविष्य में हमला कर सकते हैं।
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं और युवावस्था में कदम रखते हैं, हमारी इम्युनिटी अपने सबसे बेहतरीन और ताकतवर स्तर पर आ जाती है। बचपन में लगे टीकों और शरीर के विकास की बदौलत, युवा लोग नई बीमारियों का डटकर सामना कर पाते हैं।


