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नीम के पेड़ पर फांसी लगाकर युवक ने की आत्महत्या, जांच में जुटी पुलिस

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थाना क्षेत्र के सेहरा गांव में एक युवक द्वारा बुद्धवार को नीम के पेड़ पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर लिया गया घटना की सूचना पर थानाध्यक्ष विनोद कुमार हमराहियो के साथ घटनास्थल पर पहुच कर शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लाऐ भेजा गया वही इस घटना से पूरे गांव में शोक और सनसनी का माहौल है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, सेहरा गांव निवासी पवन सिंह (32 वर्ष), पुत्र दिवाकर सिंह ने अपने घर के पास स्थित नीम के पेड़ से लटककर अपनी जान दे दी। बताया जा रहा है कि युवक ने बिजली के केबल तार का इस्तेमाल कर फांसी लगाई।

आशंका जताई जा रही है कि उसने पहले अपने मकान की छत से नीम के पेड़ की डाल में केबल बांधा और फिर उसे गले में लपेटकर छत से कूद गया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।

सुबह जब परिजनों की नजर पेड़ की डाल पर लटके शव पर पड़ी तो परिवार में कोहराम मच गया। परिजनों ने तत्काल इसकी सूचना पुलिस को दी। सूचना मिलते ही रामपुर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

परिजनों के अनुसार, मृतक पवन सिंह अविवाहित था और हाल के दिनों में नशे की लत का शिकार हो गया था। हालांकि, आत्महत्या के पीछे के वास्तविक कारणों का अभी तक स्पष्ट पता नहीं चल सका है।

थानाध्यक्ष का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए विधिक कार्रवाई की जा रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सही कारणों का खुलासा हो सकेगा।

ट्रैकर ऑन कर होर्मुज पार कर गया ईरान का टैंकर, देखती रह गई ट्रंप की सेना

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ईरान ने होर्मुज में ट्रंप की नाकेबंदी के बीच बड़ा दावा किया है। बुधवार को ईरानी ने कहा कि अमेरिका द्वारा ब्लैकलिस्ट किए गए उनके सुपरटैंकर ने ट्रैकर चालू रखते हुए अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र और होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलेआम पार किया है। अब ये सुपरटैंकर बिना किसी नुकसान के ईरान के तटों तक पहुंच गया है।

दूतावास ने दी जानकारी

मुंबई में ईरान के महावाणिज्य दूतावास ने X पर एक पोस्ट में बताया कि अमेरिका द्वारा ब्लैकलिस्ट किया गया एक बहुत बड़ा क्रूड कैरियर (VLCC), अमेरिकी नाकेबंदी के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करके ईरान के तटों तक पहुंच गया है। पोस्ट में कहा गया है कि यह ईरानी सुपरटैंकर अपने ट्रैकर को चालू रखते हुए खुलेआम आगे बढ़ा और बिना किसी छिपाव के अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र को पार कर गया।

अमेरिका की नाकेबंदी

इससे पहले अमेरिका ने कहा था कि उसने होर्मुज में ऐसी नाकेबंदी शुरू कर दी है, जिसके तहत ईरान के बंदरगाहों से आने वाले किसी भी जहाजों को रोका जाएगा; साथ ही, अमेरिका हर उस जहाज को रोकेगा जिसने ईरान को कोई शुल्क (टोल) दिया है।

बंगाल में मेरा बूथ सबसे मजबूत कार्यक्रम, पीएम मोदी आज बंगाल के कार्यकर्ताओं में भरेंगे जोश

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 बंगाल में विधानसभा चुनावों के बीच भाजपा ने अपने सांगठनिक ढांचे को और धारदार बनाने में जुटी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मंगलवार को (नववर्ष पायला बैसाख से पहले) बंगाल के भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत’ कार्यक्रम के तहत सीधा संवाद करेंगे।

इस मेगा इवेंट का उद्देश्य जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना और प्रत्येक बूथ पर जीत सुनिश्चित करना है। प्रधानमंत्री मोदी ‘नमो ऐप’ के माध्यम से वर्चुअल बंगाल के बूथ, मंडल और जिला स्तर के कार्यकर्ताओं से जुड़ेंगे।

किस समय होगा कार्यक्रम?

बंगाल भाजपा के मीडिया प्रभारी बिमल शंकर नंद ने कहा कि कार्यक्रम का समय दोपहर में संभावित है, ताकि अधिक से अधिक कार्यकर्ता अपनी व्यस्तता के बीच इसमें शामिल हो सकें। इस दौरान पीएम न केवल विकास का संदेश देंगे, बल्कि कार्यकर्ताओं से उनके अनुभव और सुझाव भी साझा करेंगे।

जमीनी स्तर पर घेराबंदी की तैयारी

  • बंगाल भाजपा ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए ‘बूथ सशक्तीकरण अभियान’ के तहत ब्लूप्रिंट तैयार किया है, प्रत्येक बूथ पर 11 सदस्यीय कमेटी के साथ 20 सक्रिय सदस्यों की टोली।
  • पन्ना प्रमुर्ख मतदाता सूची के हर पन्ने के लिए एक जिम्मेदार कार्यकर्ता की नियुक्ति।
  • सोशल इंजीनियरिंग-समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला प्रतिनिधियों की अनिवार्य भागीदारी।

परिवर्तन की आवाज बनेंगे कार्यकर्ता

पार्टी की ओर से जारी संदेश में कहा गया है कि यह संवाद केवल एकतरफा भाषण नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के विचारों और सपनों को सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचाने का मंच है।

संघ के जमीनी संगठनकर्ताओं का भी बंगाल चुनाव में दिख सकता है असर, मजबूत हुई पकड़

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 बंगाल में पिछले डेढ़ दशक में एक संगठन ने खामोशी से अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं कि अब उसकी मौजूदगी को नजरअंदाज करना आसान नहीं रहा। भाजपा की वैचारिक रीढ़ माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने बेहद सुनियोजित ढंग से राज्य के गांवों से शहर के मोहल्लों तक अपनी पकड़ मजबूत की है।

आंकड़े इस बदलती तस्वीर की साफ गवाही देते हैं-महज 15 साल में शाखाओं (मिलन सहित) की संख्या 900 से बढ़कर 4300 के आसपास पहुंच गई है। यह सिर्फ विस्तार नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बढ़ती पकड़ और संगठित रणनीति का संकेत है। आरएसएस खुद को गैरराजनीतिक संगठन बताता है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका विस्तार भाजपा के लिए मजबूत आधार तैयार कर रहा है और संघ के जमीनी संगठनकर्ता चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बंगाल में 18 सीटें मिलने के पीछे आरएसएस के ग्राउंडवर्क को एक अहम कारण माना गया था। हालांकि 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन उसके बाद से संघ लगातार संगठन के विस्तार पर जोर दे रहा है।

मध्य बंगाल में तेज विस्तार

बंगाल में आरएसएस के तीन क्षेत्रीय प्रभाग हैं, उत्तर बंग प्रांत (उत्तर बंगाल के जिले), मध्य बंग प्रांत (पूर्व व पश्चिम ब‌र्द्धमान, बीरभूम, बांकुड़ा, मुर्शिदाबाद और पुरुलिया) व दक्षिण बंग प्रांत (दक्षिण बंगाल के जिले)। संघ के पूर्वी क्षेत्र के सह प्रचार प्रमुख जिष्णु बसु ने बताया कि खास तौर पर मध्य बंगाल क्षेत्र में 2023 से 2025 के बीच 500 से अधिक नई शाखाएं (मिलन सहित) जोड़ी गईं।

मार्च 2023 में जहां यहां 1,320 शाखाएं थी, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 1,823 हो गई। इस दौरान उत्तर बंग प्रांत में शाखाओं की सख्या 1,034 से बढ़कर 1,153 तथा दक्षिण बंग प्रांत में 1,206 से बढ़कर 1.564 हो गई।

बसु ने बताया कि इस तीव्र वृद्धि को एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो स्थानीय आबादी के बीच आरएसएस की गतिविधियों में बढ़ती रुचि को दर्शाता है। संघ ने हर ग्राम पंचायत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का लक्ष्य रखा गया है। बसु ने कहा कि संघ के कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर मतदान के लिए लोगों को जागरूक कर रहे हैं।

बदलती जनसांख्यिकी चिंता का विषय, हिंदू एकता बना मुद्दा

भाजपा बंगाल में विशेष रूप से सीमावर्ती जिलों में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर मुखर रही है। जिष्णु बसु के अनुसार, इन क्षेत्रों में हिंदू आबादी में गिरावट आई है, जिसके चलते हिंदू एकता एक प्रमुख मुद्दा बन गई है। बंगाल की बदलती जनसांख्यिकी चिंता का विषय है। हमारा लक्ष्य जागरूकता बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि हिंदू राजनीतिक और सामाजिक रूप से एकजुट रहें।

सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों से पकड़ मजबूत

दुर्गा पूजा, रामनवमी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में आरएसएस की भागीदारी बढ़ी है। इसके अलावा स्थानीय समस्याओं जैसे सड़क, पानी, शिक्षा आदि पर लोगों के साथ संवाद कर संगठन अपनी जमीनी पहुंच मजबूत कर रहा है। इससे आम परिवारों के साथ सीधा संपर्क बन रहा है।

राजनीतिक नजरिये से अहम भूमिका

जादवपुर विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के प्रोफेसर ईमनकल्याण लाहिड़ी का मानना है कि आरएसएस की यह बढ़ती संगठनात्मक ताकत राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अगर यह ग्रासरूट नेटवर्क इसी तरह मजबूत होता रहा, तो यह न सिर्फ चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है, बल्कि बंगाल के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में भी बदलाव ला सकता है। फिलहाल, सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि 2026 के चुनाव में आरएसएस का यह विस्तार किस हद तक असर डालता है।

गर्मियों में फैमिली वेकेशन के लिए परफेक्ट हैं भारत की ये 5 जगहें, बच्चों को भी आएगा खूब मजा

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गर्मी का मौसम आते ही मन किसी ठंडी और शांत जगह जाने को करने लगता है। जल्द ही बच्चों के समर वेकेशन भी शुरू हो जाएंगे। इस दौरान फैमिली वेकेशन का प्लान बनाना बच्चों के लिए रोमांचक अनुभव हो सकता है और आपको भी काम से ब्रेक लेने का मौका मिल जाएगा।

अगर आप भी इस समर सीजन में परिवार के साथ यादगार पल बिताने लिए बेहतर डेस्टिनेशन की तलाश में हैं, तो भारत की ये 5 जगहें आपके लिए परफेक्ट हो सकती हैं।

मनाली, हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश का मनाली शहर उत्तर भारत में फैमिली वेकेशन के लिए सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला डेस्टिनेशन है। यहां की ठंडी हवाएं, देवदार के घने जंगल और व्यास नदी का शोर हर किसी का मन मोह लेते हैं। रोहतांग पास और सोलंग वैली में आप गर्मियों में भी बर्फ का आनंद ले सकते हैं। यहां पैराग्लाइडिंग, रिवर राफ्टिंग और मॉल रोड पर शॉपिंग के साथ-साथ यहां के प्रसिद्ध हिडिम्बा देवी मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं।

ऊटी, तमिलनाडु

दक्षिण भारत में स्थित ऊटी को हिल स्टेशन्स की रानी भी कहा जाता है, जो अपने सुहावने मौसम और चाय के बागानों के लिए जानी जाती है। परिवार के साथ शांत वातावरण में समय बिताने के लिए यह एक शानदार जगह है। यहां की नीलगिरि माउंटेन रेलवे बच्चों को खूब पसंद आती है। ऊटी झील में बोटिंग, बॉटनिकल गार्डन की सैर और डोडाबेट्टा पीक से सुंदर नजारों का आनंद लेना आपकी यात्रा को यादगार बना देगा।

मुन्नार, केरल

केरल का मुन्नार शहर अपने खूबसूरत चाय के बागानों और धुंध भरी पहाड़ियों के लिए जाना जाता है। अगर आप अपनी फैमिली को प्रकृति के करीब ले जाना चाहते हैं, तो मुन्नार से बेहतर कुछ नहीं। यहां की हरियाली और शांति शहर की भागदौड़ से दूर सुकून देती है। एराविकुलम नेशनल पार्क में नीलगिरि तहर को देखना, मट्टुपेट्टी बांध की सैर और टी म्यूजियम का दौरा करना बच्चों के लिए काफी रोमांचक हो सकता है।

लेह-लद्दाख

अगर आपकी फैमिली एडवेंचर की शौकीन है, तो लद्दाख की यात्रा एक वंस इन अ लाइफटाइम अनुभव हो सकता है। यहां की नीली झीलें और पथरीले पहाड़ आपको एक अलग ही दुनिया का अहसास कराएंगे। यहां आप पैंगोंग झील और नुब्रा वैली का खूबसूरत नजारा देख सकते हैं। डबल हंप ऊंट की सवारी, मैग्नेटिक हिल और प्राचीन मठों की शांति आपके ट्रिप को यादगार बना देंगे।

नैनीताल, उत्तराखंड

झीलों के शहर के नाम से मशहूर नैनीताल दिल्ली और आसपास के शहरों से बेहद नजदीक है और यहां काफी आसानी से पहुंच सकते हैं। नैनी झील के चारों ओर बसा यह शहर रात में रोशनी से जगमगाते हुए किसी जन्नत जैसा लगता है। नैनी झील में बोटिंग, नैनी पीक की ट्रेकिंग और केव गार्डन की सैर बच्चों को बहुत पसंद आएगी।

जरूरी बातें

  • गर्मियों में भारी भीड़ होती है, इसलिए होटल और फ्लाइट की बुकिंग अभी से ही कर लें।
  • पहाड़ी इलाकों में रात के समय हल्की ठंड हो सकती है, इसलिए साथ में हल्के जैकेट या स्वेटर जरूर रखें।
  • ऊंचाई वाले इलाकों, जैसे लेह में जाते समय हाइड्रेटेड रहें और दवाइयां साथ रखें, खासकर आपको कोई बीमारी है।

बिना लक्षण के भी शरीर में पनप सकता है प्रोस्टेट कैंसर, इससे जुड़े 3 बड़े मिथकों का डॉक्टर ने बताया सच

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 बढ़ती उम्र की बीमारियों में प्रोस्टेट की समस्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात है कि प्रोस्टेट कैंसर भारतीय पुरुषों में तीसरा सबसे आम कैंसर है। चूंकि, मुख्य रूप से यह अधिक उम्र के पुरुषों को ही प्रभावित करता है, इसलिए उम्र बढ़ने के लिए इसे लेकर सतर्क रहना चाहिए।

डॉ. सुधीर रावल (मेडिकल डायरेक्टर, जेनिटो-यूरो आन्कोलाजी, राजीव गांधी कैंसर अस्पताल, दिल्ली) बताते हैं कि आमतौर इस बीमारी का पता करीब 65 साल की उम्र के आसपास चलता है। अनुमान है कि हर 125 पुरुषों में से एक को इसके जोखिम की आशंका रहती है।

प्रोस्टेट कैंसर पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती। कई पुरुष कैंसर को केवल दर्द या दिखाई देने वाली बीमारी से जोड़ते हैं और जब तक वे खुद को स्वस्थ महसूस करते हैं, तब तक स्वास्थ्य संबंधी बातचीत को टालते रहते हैं। लक्षणों और इलाज से जुड़े ये मिथक बीमारी को गंभीर बना सकते हैं। कुछ लोग तो यहां तक मानते हैं कि जब तक दर्द या स्पष्ट लक्षण न हों, तब तक चिंता की जरूरत नहीं है। यही मिथक समय पर जांच और इलाज में देरी का कारण बनते हैं।

मिथक 1: अगर मैं स्वस्थ महसूस करता हूं तो मुझे प्रोस्टेट कैंसर नहीं हो सकता

सच्चाई: प्रोस्टेट कैंसर शुरुआती चरण में अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होता है। ज्यादातर मामलों में लक्षण तब दिखते हैं जब बीमारी आगे बढ़ चुकी होती है, जिससे इलाज जटिल हो सकता है।

भारत में जागरूकता की कमी और नियमित स्क्रीनिंग का अभाव भी देर से पहचान का कारण बनता है। उम्र बढ़ने के साथ या परिवार में इस बीमारी का इतिहास होने पर जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों को डाक्टर से सलाह लेकर नियमित जांच करानी चाहिए, ताकि समय पर पहचान और बेहतर इलाज संभव हो सके।

मिथक 2: प्रोस्टेट कैंसर होने पर मुझे दर्दनाक इलाज से गुजरना पड़ेगा :

सच्चाई: आज के समय में इसका इलाज बेहतर और पर्सनलाइज्ड हो चुका है। हर मरीज को एक जैसे इलाज की जरूरत नहीं होती। इलाज का तरीका उम्र, बीमारी के स्टेज, सामान्य स्वास्थ्य और मरीज की प्राथमिकताओं के आधार पर तय होता है।

यहां तक कि उन्नत (मेटास्टेटिक) स्टेज में भी कई मामलों में हार्मोनल थेरेपी और नई लक्षित (टार्गेटेड) दवाओं से इलाज संभव है, जिसमें कीमोथेरेपी की जरूरत भी नहीं पड़ती। इससे मरीज अपने रोजमर्रा के काम और जीवनशैली को काफी हद तक सामान्य बनाए रख सकते हैं।

मिथक 3: अगर कैंसर फैल गया है, तो अब कुछ नहीं किया जा सकता

सच्चाई: कैंसर का एडवांस स्टेज अंत नहीं है। जब प्रोस्टेट कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाता है, तब भी इलाज के कई विकल्प उपलब्ध होते हैं।

नई और आधुनिक थेरेपी बीमारी की गति को धीमा कर सकती हैं, लक्षणों को कम कर सकती हैं और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने में मदद करती हैं। आज कई मरीजों के लिए एडवांस प्रोस्टेट कैंसर एक दीर्घकालिक (क्रानिक) बीमारी की तरह मैनेज किया जा रहा है, जिसमें समय-समय पर इलाज को मरीज की जरूरत के अनुसार बदला जाता है।

उम्र के साथ प्रोस्टेट कैंसर का जोखिम बढ़ता है, लेकिन सही जानकारी और जागरूकता से उपचार संभव है। 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों को अपने डाक्टर से प्रोस्टेट स्वास्थ्य, जांच के विकल्प और उपलब्ध इलाज के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए, ताकि सही समय पर सही कदम उठाए जा सकें।

किस तरह के होते हैं शुरुआती लक्षण

प्रोस्टेट कैंसर अक्सर चुपके से पनपता है। प्रोस्टेट कैंसर के शुरुआती लक्षणों में पेशाब करने में दिक्कत, पेल्विक हिस्से में दर्द, पेशाब में खून आना, बार-बार पेशाब आना, या पेशाब का बहाव शुरू करने या उसे बनाए रखने में कठिनाई शामिल हो सकती है।

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?

50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों को नियमित रूप से प्रोस्टेट कैंसर की स्क्रीनिंग करवाने और अपने डाक्टर से सलाह लेने की सलाह दी जाती है- विशेष रूप से जब पेशाब में खून दिखाई दे, क्योंकि यह प्रोस्टेट कैंसर का एक आम लक्षण है।

क्या आप भी रोज खाते हैं रोटी-चावल? जापानी स्टडी का दावा- बिना एक्स्ट्रा कैलोरी भी बढ़ सकता है मोटापा

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 अक्सर हम मानते हैं कि वजन तभी बढ़ता है जब हम बहुत ज्यादा कैलोरी खाते हैं। लेकिन हाल ही में हुए एक चौंकाने वाले शोध ने इस धारणा को चुनौती दी है।

ओसाका मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शिगेनोबू मात्सुमुरा के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि रोटी, चावल और नूडल्स जैसे कार्बोहाइड्रेट केवल पेट भरने का काम नहीं करते, बल्कि ये आपके शरीर के मेटाबॉलिज्म को पूरी तरह बदल सकते हैं।

चूहों पर किया गया दिलचस्प प्रयोग

इस शोध के दौरान चूहों के खान-पान के व्यवहार का बारीकी से विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि जब चूहों को उनके नियमित चारे के साथ गेहूं, रोटी और चावल जैसे कार्बोहाइड्रेट युक्त विकल्प दिए गए, तो उन्होंने अपने सामान्य आहार को छोड़कर इन चीजों को खाना पसंद किया।

यह खोज दर्शाती है कि कार्बोहाइड्रेट से भरपूर फूड्स के प्रति एक स्वाभाविक झुकाव या पसंद होती है, जो खाने के व्यवहार को प्रभावित करती है।

बिना एक्स्ट्रा कैलोरी के वजन बढ़ना?

अध्ययन का सबसे हैरान कर देने वाला हिस्सा यह था कि चूहों ने बहुत अधिक कैलोरी का सेवन नहीं किया था, फिर भी उनके वजन और शरीर की वसा (fat) में बढ़ोतरी देखी गई। इसका कारण ज्यादा खाना नहीं था। दरअसल, इन खाद्य पदार्थों के सेवन से चूहों के शरीर ने ऊर्जा का उपयोग कम कर दिया।

आसान शब्दों में कहें तो, शरीर ने कैलोरी को जलाने के बजाय उसे फैट के रूप में जमा करना शुरू कर दिया। मुख्य बात यह है कि मोटापा केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आप कितना खा रहे हैं, बल्कि इस पर भी निर्भर करता है कि आपका शरीर उस भोजन का उपयोग कैसे कर रहा है।

क्या समस्या खाने में है या हमारे चुनाव में?

पूरी दुनिया में रोटी, चावल और नूडल्स रोजाना खाए जाते हैं। लंबे समय से यह बहस चली आ रही है कि क्या रोटी खाने से वजन बढ़ता है या हमें कार्बोहाइड्रेट सीमित कर देने चाहिए। शोधकर्ताओं ने इसी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की है कि समस्या खुद इन खाद्य पदार्थों में है या जिस तरह से हम इनका चुनाव और सेवन करते हैं, उसमें है।

यह अध्ययन साफ करता है कि कार्बोहाइड्रेट हमारे मेटाबॉलिज्म संबंधी प्रभावों को गहराई से प्रभावित करते हैं। जब हम रोटी या चावल जैसे खाद्य पदार्थों को चुनते हैं, तो हमारा शरीर कम ऊर्जा खर्च करने लगता है, जिससे वजन बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है।

यह जानकारी उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो अपनी डाइट को संतुलित रखने की कोशिश कर रहे हैं। अगली बार जब आप अपनी थाली में रोटी या चावल बढ़ाएं, तो याद रखें कि यह केवल कैलोरी का खेल नहीं है, बल्कि आपके मेटाबॉलिज्म के बदलने की कहानी भी है।

एक राजा के अपमान से हुई थी मशहूर कथकली नृत्य की शुरुआत, शब्दों से नहीं; आंखों से सुनाई जाती है कहानी

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 केरल की शांत वादियों से निकली कथकली महज एक नृत्य नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे पुरानी और भव्य थिएटर परंपराओं में से एक है। इसमें शब्द मौन हो जाते हैं, लेकिन कलाकारों के चेहरे के रंग, भाव और आंखें पूरी कहानी कह जाते हैं।

कथकली शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- कथा और कली यानी खेल या नाटक। इसका मतलब है नृत्य के जरिए कहानी कहना। इस नृत्य की शुरुआत भी ऐसे ही हुई थी। आइए जानें कथकली नृत्य का इतिहास क्या है और कौन-सी बातें इसे इतना खास बनाती हैं।

एक शाही चुनौती से शुरुआत

कथकली का इतिहास 17वीं शताब्दी के आसपास का माना जाता है। इसके जन्म के पीछे एक दिलचस्प लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि कालीकट के जमोरिन राजा ने कृष्णट्टम नाम का एक नृत्य-नाटक तैयार किया था। जब दक्षिण के कोट्टारक्करा के राजा ने इस नाटक को अपने महल में मंचित करने का अनुरोध किया, तो जमोरिन ने उनका अपमान कर मना कर दिया।

इस चुनौती को स्वीकार करते हुए कोट्टारक्करा के राजा ने रामायण पर आधारित रामनाट्टम की रचना की। समय के साथ, जब इसमें महाभारत और दूसरी पौराणिक कथाओं को जोड़ा गया, तो यह रामनाट्टम से विकसित होकर कथकली बन गया। मंदिर की सीमाओं से बाहर निकलकर जनमानस तक पहुंचने के कारण इसकी लोकप्रियता पूरी दुनिया में फैल गई।

चेहरे के रंग भी कहता है कहानी

कथकली की सबसे बड़ी खासियत इसका शृंगार और वेशभूषा है, जिसे कोप्पु कहा जाता है। इसमें चेहरे के रंगों के आधार पर पात्रों की प्रकृति तय होती है। मुख्य रूप से इसमें पांच प्रकार के वेष होते हैं-

  • पचा (हरा)- यह रंग नेक, वीर और कोमल दिल वाले पात्रों जैसे कृष्ण, अर्जुन या राम के लिए इस्तेमाल होता है। यह पवित्रता और मर्यादा का प्रतीक है।
  • कथी (छुरी)- इसमें चेहरे पर हरा रंग तो होता है, लेकिन नाक पर सफेद रंग की छोटी गेंद और लाल धारियां होती हैं। यह उन पात्रों के लिए है जो शक्तिशाली तो हैं, लेकिन जिनमें अहंकार या बुराई है, जैसे -रावण।
(Picture Courtesy: Kerala Tourism)
  • थाड़ी (दाढ़ी)- इसमें तीन प्रकार होते हैं, लाल दाढ़ी (बेहद दुष्ट), सफेद दाढ़ी (हनुमान जैसे सात्विक और भक्तिपूर्ण पात्र), और काली दाढ़ी (जंगली या शिकारी पात्र)।
  • करी (काला)- यह पूरी तरह से तामसिक और क्रूर पात्रों के लिए होता है।
  • मिनुक्कू (चमक)- यह ऋषि-मुनियों और स्त्री पात्रों के लिए इस्तेमाल होता है, जिसमें चेहरे पर हल्का पीला या नारंगी रंग लगाया जाता है।

एक खास बात यह है कि कलाकार अपनी आंखों को लाल करने के लिए प्राकृतिक बीजों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनकी आंखों की पुतलियों का संचालन दर्शकों को साफ-साफ दिखाई दे सके।

अभिनय की बारीकियां और संगीत

कथकली में कलाकार बोलता नहीं है; वह मुद्राओं और चेहरे के भाव के जरिए अपनी बात करता है। इसकी संगीत शैली को सोपानम कहा जाता है, जिसे अभिनय संगीतम भी कहते हैं। भारी वेशभूषा और लंबे समय तक चलने वाले इस नृत्य के लिए कलाकार को सालों के कठिन अभ्यास और शारीरिक अनुशासन की जरूरत होती है।

सौतेली बहन Esha Deol संग अपने रिश्ते पर Bobby Deol ने तोड़ी चुप्पी, बोले- ‘आप एक-दूसरे को गलत…’

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 कई बार दुख की घड़ी पूरे परिवार को एक साथ ला देती है। पिछले साल दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र के निधन के बाद देओल परिवार भी इसी दुख से उबरने की कोशिश कर रहा है। हाल ही में धर्मेंद्र और प्रकाश कौर के छोटे बेटे बॉबी देओल (Bobby Deol) ने खुलकर बात की और बताया कि पिता के जाने के बाद उनकी अपनी दोनों सौतेली बहनों, एशा देओल (Esha Deol) और आहना देओल के साथ रिश्ते अब कैसे हैं।

पिता के जाने के बाद सौतेली बहनों से बढ़ी नजदीकियां?

दरअसल, बीते साल जब धर्मेंद्र का निधन हुआ था, तो हेमा मालिनी, उनकी दोनों बेटियों और सनी देओल ने अलग-अलग प्रेयर मीट रखी थी। इसके बाद दोनों परिवारों के बीच मनमुटाव की खबरों ने खूब जोर पकड़ा था। अब हाल ही में इस्क्वायर इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में बॉबी देओल ने साफ किया है कि हेमा मालिनी की दोनों बेटियों संग उनके रिश्ते कैसे हैं। बॉबी देओल ने कहा

अब परिवार को ज्यादा समय देते हैं बॉबी देओल

बॉबी देओल ने पिता धर्मेंद्र के साथ ज्यादा समय न बिता पाने पर गहरा दुख भी व्यक्त किया। उन्होंने भारी मन से कहा, “पिछले कुछ दिनों से मैं यही सोचता रहा कि काश मैं उनके साथ और बैठता, उनसे और सवाल पूछे होते। अब मैं पहले से कहीं ज्यादा अपने परिवार के साथ समय बिताने की कोशिश करता हूं।”आपको बता दें कि बीते साल अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद धर्मेंद्र को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। कुछ दिनों बाद उन्हें घर लाया गया, जहां डॉक्टर्स की देख-रेख में ‘शोले’ एक्टर का इलाज चल रहा था। लेकिन 24 नवंबर को दिग्गज अभिनेता ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया, जिससे पूरे देश और बॉलीवुड में शोक की लहर दौड़ गई थी।

Suniel Shetty ने ठुकारा दी थी अक्षय कुमार की 18 साल पुरानी फिल्म, बाद में बनी थी ब्लॉकबस्टर

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सुनील शेट्टी और अक्षय कुमार इंडस्ट्री के दो बड़े सुपरस्टार के तौर पर जाने जाते हैं। इन दोनों की दोस्ती के किस्से जगजाहिर हैं। सुनील और अक्षय ने अपने एक्टिंग करियर ज्यादातर कल्ट मूवीज एक दूसरे के साथ में ही दी हैं।

अच्छे दोस्त होने के बावजूद 18 साल पहले सुनील शेट्टी ने अक्षय कुमार की फिल्म के ऑफर को रिजेक्ट कर दिया था, जो बाद में बॉक्स ऑफिस पर जाकर ब्लॉकबस्टर बनी थी। आइए जानते हैं कि यहां कौन सी पुरानी फिल्म की बात की जा रही है और सुनील की जगह उस फिल्म में कौन से अभिनेता को लिया गया था।

सुनील ने रिजेक्ट की थी ये मूवी

90 के दशक से लेकर अब तक सुनील शेट्टी हिंदी सिनेमा के दमदार अभिनेता के तौर पर अपनी धाक जमाए हुए हैं। 35 साल से ज्यादा लंबे फिल्मी करियर में उन्होंने कई शानदार मूवीज के जरिए दर्शकों का मनोरंजन किया है, लेकिन कई फिल्में ऐसी रहीं, जिनमें काम करने से अन्ना ने मना कर दिया था। उनमें से एक फिल्म थी अक्षय कुमार स्टारर सिंह इज किंग।

आईएमडीबी की रिपोर्ट के अनुसार साल 2008 में रिलीज होने वाली सिंह इज किंग के लिए सुनील शेट्टी मेकर्स की पहली पसंद थे। दरअसल फिल्म में अक्षय के अलावा उनको लखन सिंह के सेकेंड लीड रोल में कास्ट जाना था, जिसको बाद में अभिनेता सोनू सूद ने प्ले किया था। सुनील ने बिजी शेड्यूल और दूसरी अन्य फिल्मों के साथ कॉन्ट्रैक साइन के चलते सिंह इज किंग के ऑफर को ठुकरा दिया था।

मालूम हो कि बाद में जाकर सिंह इंज किंग ब्लॉकबस्टर बनी और मूवी ने बॉक्स ऑफिस पर धमाकेदार कमाई करके दिखाई। बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के अनुसार इस मूवी ने उस वक्त घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 67 करोड़ से ज्यादा का कारोबार किया था, जबकि वर्ल्डवाइड इसकी कमाई 90 करोड़ से अधिक रही थी।

अक्षय और सुनील की फिल्में

अभिनेता अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी ने एक साथ मिलकर कई एक्शन और कॉमेडी फिल्में की हैं, जो कमर्शियल तौर पर हिट रहीं। उनके नाम इस प्रकार हैं-

  • हम हैं बेमिसाल
  • मोहरा
  • धड़कन
  • आन
  • हेरा फेरी
  • फिर हेरा फेरी
  • दे दनादन

मालूम हो कि आने वाले समय में सुनील और अक्षय की जोड़ी फिल्म वेलकम टू द जंगल और हेरा फेरी 3 में भी नजर आएगी।