बंगाल में पिछले डेढ़ दशक में एक संगठन ने खामोशी से अपनी जड़ें इतनी गहरी कर ली हैं कि अब उसकी मौजूदगी को नजरअंदाज करना आसान नहीं रहा। भाजपा की वैचारिक रीढ़ माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने बेहद सुनियोजित ढंग से राज्य के गांवों से शहर के मोहल्लों तक अपनी पकड़ मजबूत की है।
आंकड़े इस बदलती तस्वीर की साफ गवाही देते हैं-महज 15 साल में शाखाओं (मिलन सहित) की संख्या 900 से बढ़कर 4300 के आसपास पहुंच गई है। यह सिर्फ विस्तार नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बढ़ती पकड़ और संगठित रणनीति का संकेत है। आरएसएस खुद को गैरराजनीतिक संगठन बताता है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका विस्तार भाजपा के लिए मजबूत आधार तैयार कर रहा है और संघ के जमीनी संगठनकर्ता चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बंगाल में 18 सीटें मिलने के पीछे आरएसएस के ग्राउंडवर्क को एक अहम कारण माना गया था। हालांकि 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, लेकिन उसके बाद से संघ लगातार संगठन के विस्तार पर जोर दे रहा है।
मध्य बंगाल में तेज विस्तार
बंगाल में आरएसएस के तीन क्षेत्रीय प्रभाग हैं, उत्तर बंग प्रांत (उत्तर बंगाल के जिले), मध्य बंग प्रांत (पूर्व व पश्चिम बर्द्धमान, बीरभूम, बांकुड़ा, मुर्शिदाबाद और पुरुलिया) व दक्षिण बंग प्रांत (दक्षिण बंगाल के जिले)। संघ के पूर्वी क्षेत्र के सह प्रचार प्रमुख जिष्णु बसु ने बताया कि खास तौर पर मध्य बंगाल क्षेत्र में 2023 से 2025 के बीच 500 से अधिक नई शाखाएं (मिलन सहित) जोड़ी गईं।
मार्च 2023 में जहां यहां 1,320 शाखाएं थी, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर 1,823 हो गई। इस दौरान उत्तर बंग प्रांत में शाखाओं की सख्या 1,034 से बढ़कर 1,153 तथा दक्षिण बंग प्रांत में 1,206 से बढ़कर 1.564 हो गई।
बसु ने बताया कि इस तीव्र वृद्धि को एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो स्थानीय आबादी के बीच आरएसएस की गतिविधियों में बढ़ती रुचि को दर्शाता है। संघ ने हर ग्राम पंचायत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का लक्ष्य रखा गया है। बसु ने कहा कि संघ के कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर मतदान के लिए लोगों को जागरूक कर रहे हैं।
बदलती जनसांख्यिकी चिंता का विषय, हिंदू एकता बना मुद्दा
भाजपा बंगाल में विशेष रूप से सीमावर्ती जिलों में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर मुखर रही है। जिष्णु बसु के अनुसार, इन क्षेत्रों में हिंदू आबादी में गिरावट आई है, जिसके चलते हिंदू एकता एक प्रमुख मुद्दा बन गई है। बंगाल की बदलती जनसांख्यिकी चिंता का विषय है। हमारा लक्ष्य जागरूकता बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि हिंदू राजनीतिक और सामाजिक रूप से एकजुट रहें।
सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों से पकड़ मजबूत
दुर्गा पूजा, रामनवमी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में आरएसएस की भागीदारी बढ़ी है। इसके अलावा स्थानीय समस्याओं जैसे सड़क, पानी, शिक्षा आदि पर लोगों के साथ संवाद कर संगठन अपनी जमीनी पहुंच मजबूत कर रहा है। इससे आम परिवारों के साथ सीधा संपर्क बन रहा है।
राजनीतिक नजरिये से अहम भूमिका
जादवपुर विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के प्रोफेसर ईमनकल्याण लाहिड़ी का मानना है कि आरएसएस की यह बढ़ती संगठनात्मक ताकत राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
अगर यह ग्रासरूट नेटवर्क इसी तरह मजबूत होता रहा, तो यह न सिर्फ चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है, बल्कि बंगाल के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में भी बदलाव ला सकता है। फिलहाल, सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि 2026 के चुनाव में आरएसएस का यह विस्तार किस हद तक असर डालता है।
