बिना लक्षण के भी शरीर में पनप सकता है प्रोस्टेट कैंसर, इससे जुड़े 3 बड़े मिथकों का डॉक्टर ने बताया सच

 बढ़ती उम्र की बीमारियों में प्रोस्टेट की समस्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात है कि प्रोस्टेट कैंसर भारतीय पुरुषों में तीसरा सबसे आम कैंसर है। चूंकि, मुख्य रूप से यह अधिक उम्र के पुरुषों को ही प्रभावित करता है, इसलिए उम्र बढ़ने के लिए इसे लेकर सतर्क रहना चाहिए।

डॉ. सुधीर रावल (मेडिकल डायरेक्टर, जेनिटो-यूरो आन्कोलाजी, राजीव गांधी कैंसर अस्पताल, दिल्ली) बताते हैं कि आमतौर इस बीमारी का पता करीब 65 साल की उम्र के आसपास चलता है। अनुमान है कि हर 125 पुरुषों में से एक को इसके जोखिम की आशंका रहती है।

प्रोस्टेट कैंसर पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती। कई पुरुष कैंसर को केवल दर्द या दिखाई देने वाली बीमारी से जोड़ते हैं और जब तक वे खुद को स्वस्थ महसूस करते हैं, तब तक स्वास्थ्य संबंधी बातचीत को टालते रहते हैं। लक्षणों और इलाज से जुड़े ये मिथक बीमारी को गंभीर बना सकते हैं। कुछ लोग तो यहां तक मानते हैं कि जब तक दर्द या स्पष्ट लक्षण न हों, तब तक चिंता की जरूरत नहीं है। यही मिथक समय पर जांच और इलाज में देरी का कारण बनते हैं।

मिथक 1: अगर मैं स्वस्थ महसूस करता हूं तो मुझे प्रोस्टेट कैंसर नहीं हो सकता

सच्चाई: प्रोस्टेट कैंसर शुरुआती चरण में अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के विकसित होता है। ज्यादातर मामलों में लक्षण तब दिखते हैं जब बीमारी आगे बढ़ चुकी होती है, जिससे इलाज जटिल हो सकता है।

भारत में जागरूकता की कमी और नियमित स्क्रीनिंग का अभाव भी देर से पहचान का कारण बनता है। उम्र बढ़ने के साथ या परिवार में इस बीमारी का इतिहास होने पर जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों को डाक्टर से सलाह लेकर नियमित जांच करानी चाहिए, ताकि समय पर पहचान और बेहतर इलाज संभव हो सके।

मिथक 2: प्रोस्टेट कैंसर होने पर मुझे दर्दनाक इलाज से गुजरना पड़ेगा :

सच्चाई: आज के समय में इसका इलाज बेहतर और पर्सनलाइज्ड हो चुका है। हर मरीज को एक जैसे इलाज की जरूरत नहीं होती। इलाज का तरीका उम्र, बीमारी के स्टेज, सामान्य स्वास्थ्य और मरीज की प्राथमिकताओं के आधार पर तय होता है।

यहां तक कि उन्नत (मेटास्टेटिक) स्टेज में भी कई मामलों में हार्मोनल थेरेपी और नई लक्षित (टार्गेटेड) दवाओं से इलाज संभव है, जिसमें कीमोथेरेपी की जरूरत भी नहीं पड़ती। इससे मरीज अपने रोजमर्रा के काम और जीवनशैली को काफी हद तक सामान्य बनाए रख सकते हैं।

मिथक 3: अगर कैंसर फैल गया है, तो अब कुछ नहीं किया जा सकता

सच्चाई: कैंसर का एडवांस स्टेज अंत नहीं है। जब प्रोस्टेट कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल जाता है, तब भी इलाज के कई विकल्प उपलब्ध होते हैं।

नई और आधुनिक थेरेपी बीमारी की गति को धीमा कर सकती हैं, लक्षणों को कम कर सकती हैं और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने में मदद करती हैं। आज कई मरीजों के लिए एडवांस प्रोस्टेट कैंसर एक दीर्घकालिक (क्रानिक) बीमारी की तरह मैनेज किया जा रहा है, जिसमें समय-समय पर इलाज को मरीज की जरूरत के अनुसार बदला जाता है।

उम्र के साथ प्रोस्टेट कैंसर का जोखिम बढ़ता है, लेकिन सही जानकारी और जागरूकता से उपचार संभव है। 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों को अपने डाक्टर से प्रोस्टेट स्वास्थ्य, जांच के विकल्प और उपलब्ध इलाज के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए, ताकि सही समय पर सही कदम उठाए जा सकें।

किस तरह के होते हैं शुरुआती लक्षण

प्रोस्टेट कैंसर अक्सर चुपके से पनपता है। प्रोस्टेट कैंसर के शुरुआती लक्षणों में पेशाब करने में दिक्कत, पेल्विक हिस्से में दर्द, पेशाब में खून आना, बार-बार पेशाब आना, या पेशाब का बहाव शुरू करने या उसे बनाए रखने में कठिनाई शामिल हो सकती है।

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?

50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों को नियमित रूप से प्रोस्टेट कैंसर की स्क्रीनिंग करवाने और अपने डाक्टर से सलाह लेने की सलाह दी जाती है- विशेष रूप से जब पेशाब में खून दिखाई दे, क्योंकि यह प्रोस्टेट कैंसर का एक आम लक्षण है।

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