वैशाख मास की तपिश के बीच बंगाल की राजनीतिक फिजां अब उस मोड़ पर आ गई है, जहां शब्द केवल संवाद नहीं बल्कि भविष्य की पटकथा लिख रहे हैं। उत्तर बंगाल के कूचबिहार से शुरू हुआ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चुनावी अभियान गुरुवार को दक्षिण बंगाल के मैदानी इलाकों में और अधिक मुखर हो गया।
पूर्व मेदिनीपुर के हल्दिया, पश्चिम बर्द्धमान के आसनसोल और बीरभूम जिले के सिउड़ी की रैलियों में प्रधानमंत्री ने न केवल 39 सीटों के समीकरण साधे, बल्कि एक ऐसी भाषाई और प्रतीकात्मक बिसात बिछाई है जो तृणमूल कांग्रेस की पारंपरिक घेरेबंदी को सीधे चुनौती दे रही है।
इन सभाओं में उनका संदेश सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि एक सुविचारित बहुस्तरीय राजनीतिक रणनीति के रूप में सामने आया, जिसमें विकास, सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक समीकरण और जवाबदेही-चारों स्तरों पर एक साथ हस्तक्षेप करने की कोशिश दिखी।
सांस्कृतिक प्रतीकों से ‘बंगाली अस्मिता’ पर दस्तक
प्रधानमंत्री की रैलियों में उनके स्वागत के तरीके और उन्हें भेंट की गई वस्तुएं महज औपचारिकता नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का एक सधा हुआ प्रयास थीं। हल्दिया में सीता-राम और हनुमान की मूर्ति के साथ ‘पद्दो’ (कमल फूल) की माला, आसनसोल में मां दुर्गा की प्रतिमा और कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की तस्वीर, रजनीगंधा की माला और बीरभूम में तारापीठ की शक्ति के साथ ‘एकतारा’ का उपहार-यह सब एक सोची-समझी सांस्कृतिक संदेशवाहक की भूमिका निभा रहे थे।
मोदी ने 2024 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित तकदीरा बेगम जैसी हस्तियों का नाम लेकर यह संदेश दिया कि उनकी ‘सबका साथ’ की नीति में बंगाल की कला और मुस्लिम समाज का योगदान भी शामिल है। यह सीधे तौर पर मुख्यमंत्री ममता के उस नैरेटिव पर प्रहार है जिसमें भाजपा को ‘बाहरी’ बताया जाता रहा है।
नाम नहीं लिया, पर ‘निर्मम’ कहकर बहुत कुछ कह दिया
आज की पूरी चुनावी यात्रा में सबसे दिलचस्प पक्ष प्रधानमंत्री का ‘शब्द चयन’ रहा। बीते चार दिनों में 101 मिनट के संबोधन के दौरान मोदी ने एक बार भी ‘ममता बनर्जी’ का नाम नहीं लिया। इसके बजाय उन्होंने ‘निर्मम सरकार’ शब्द का प्रयोग किया। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह एक गहरा भाषाई वार है। मुख्यमंत्री का नाम ‘ममता’ है, जिसका अर्थ करुणा होता है, जबकि मोदी ने उसे ‘निर्ममता’ से जोड़कर एक नया विलोम शब्द खड़ा कर दिया।
इस रणनीतिक शब्द के जरिए उन्होंने भ्रष्टाचार, हिंसा और सिंडिकेट राज के आरोपों को बिना मुख्यमंत्री का नाम लिए सीधा उनकी छवि से जोड़ने का प्रयास किया। मछली पर पलटवार और ध्रुवीकरण की काटममता अक्सर अपनी सभाओं में कहती रही हैं कि भाजपा सत्ता में आई तो बंगाल के खान-पान, विशेषकर मछली और मांस पर प्रतिबंध लगा देगी।
हल्दिया की सभा में मोदी ने मछली का जिक्र कर इस डर को खत्म करने की कोशिश की। पश्चिम बर्द्धमान और बीरभूम जैसे जिलों में, जहां मुस्लिम आबादी 15 से 42 प्रतिशत तक है, मोदी ने अपने पुराने नारे में एक नया आयाम जोड़ा,’सबका साथ, सबका विकास और बंगाल में सभी लुटेरों का होगा हिसाब।’
यह नारा संदेश देता है कि विकास सबके लिए है, लेकिन दंड केवल उन लोगों के लिए जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं।चुनावी अर्थ और भविष्य के संकेतमोदी ने इन रैलियों से यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा केवल ¨हदू मतों के ध्रुवीकरण पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह उन क्षेत्रों में भी सेंध लगा रही है जिन्हें तृणमूल का अभेद्य दुर्ग माना जाता था।
सिउड़ी की सभा में भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का नाम लेना और बीरभूम के लोक संगीत ‘बाउल’ को सम्मान देना दिखाता है कि भाजपा खुद को बंगाल की मिट्टी की रक्षक के रूप में पेश कर रही है। मोदी का यह अभियान संकेत है कि इस बार लड़ाई ‘अस्मिता बनाम आरोप’ की नहीं, बल्कि ‘ममता बनाम निर्ममता’,’भय बनाम भरोसा’ के उस नए व्याकरण पर लड़ी जा रही है, जिसे प्रधानमंत्री ने स्वयं गढ़ा है।
