असम में 10 साल बाद सत्ता में वापसी की कांग्रेस की कांग्रेस ने उम्मीद तो पाल ली लेकिन वर्तमान स्थिति में यह बहुत मुश्किल दिख रहा है। एक ओर कांग्रेस पार्टी के भीतर भयंकर गुटबाजी से त्रस्त है, जिसका परिणाम सांसद प्रद्युत बारदोलई का इस्तीफा है।
इसके अलावा परिसीमन ने मुस्लिम बहुल सीटों की कमी से विधानसभा का गणित बदल दिया है। पिछली बार बदरूद्दीन अजमल की पार्टी आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ) के साथ के कारण मुस्लिम वोटों का बंटवारा नहीं हुआ था।
कांग्रेस का खेल हो सकता है खराब
इस बार एआईयूडीएफ इन सीटों पर कांग्रेस का खेल खराब करने की पूरी कोशिश करेगी। कांग्रेस ने लोकसभा में अपने उपनेता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई के हाथ में कमान देकर प्रदेश संगठन में गुटबाजी खत्म करने और एकजुट होकर हिमंत बिस्व सरमा के सामने चुनौती पेश करने की रणनीति बनाई थी।
लेकिन फरवरी में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा और अब प्रद्युत बारदोलाई व प्रदेश उपाध्यक्ष नवज्योति तालुकदार के इस्तीफे ने प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच गहरी खाई को उजागर कर दिया। चुनाव के ठीक पहले लगे इन झटकों से पार पाना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा।
कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती मुस्लिम वोटों को बंटने से रोकने के साथ ही हिंदू वोटों को साधने की भी है। पार्टी में मौजूदा संकट की एक बड़ी वजह ये भी है। दरअसल मुस्लिम वोटों को बंटने से रोकने के लिए 2021 में कांग्रेस ने एआइयूडीएफ के साथ गठबंधन किया था, जिसका खामियाजा पार्टी को हिंदू बहुल सीटों पर चुकाना पड़ा।
इस बार कांग्रेस ने एआइयूडीएफ से किनारा जरूर कर लिया है। लेकिन मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस की टक्कर उसी से होनी तय है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मुस्लिम वोट को काफी हद तक एआइयूडीएफ से झटकने में सफल रही थी। विधानसभा चुनाव में ऐसा होगा या नहीं देखना होगा। लगभग 35 से 40 फीसद आबादी के साथ असम की राजनीति में मुसलमान अहम भूमिका निभाते थे।
