आज के तेज रफ्तार जीवन में माता-पिता बच्चों की जरूरतें पूरी करने में इतने बिजी हो जाते हैं कि इमोशनली उनके साथ रहना पीछे छूट जाता है। अच्छे स्कूल, बेहतर सुविधाएं और सुरक्षित भविष्य देना जरूरी है, लेकिन उतना ही जरूरी है कि बच्चा यह महसूस करे कि उसके माता-पिता भावनात्मक रूप से भी उसके साथ हैं।

इमोशनली प्रेजेंट होने का मतलब हर वक्त साथ रहना नहीं, बल्कि बच्चे की भावनाओं को समझना, स्वीकार करना और सही समय पर उसका साथ देना है। यह कोई एक दिन का काम नहीं, बल्कि रोजमर्रा के छोटे व्यवहारों का नतीजा है। जब बच्चा यह जान लेता है कि उसके माता-पिता उसे बिना शर्त समझते और स्वीकार करते हैं, तो वह न सिर्फ मानसिक रूप से मजबूत बनता है, बल्कि जीवन की चुनौतियों का सामना भी बेहतर तरीके से कर पाता है।

कैसे रहें अपने बच्चे की जिंदगी में इमोशनली प्रेजेंट?

  • सुनना सीखें- अक्सर बच्चे जब कुछ बताते हैं, तो माता-पिता तुरंत सलाह देने या सही-गलत समझाने लगते हैं। जबकि कई बार बच्चे को सिर्फ सुने जाने की जरूरत होती है। जब वह अपनी बात कहे, तो मोबाइल या टीवी से ध्यान हटाकर उसकी आंखों में देखें और शांत मन से सुनें। बीच में टोकने या जज करने से बचें। जब बच्चा यह महसूस करता है कि उसकी बात आपके लिए जरूरी है, तो वह भावनात्मक रूप से खुद को सुरक्षित महसूस करता है।
  • भावनाओं को स्वीकार करना सिखाएं- बच्चे कई बार अपने गुस्से, डर या उदासी को शब्दों में नहीं ढाल पाते। ऐसे में उन्हें यह समझाने की जरूरत होती है कि जो वे महसूस कर रहे हैं, वह गलत नहीं है। उनसे सवाल करें, जैसे- तुम गुस्से में हो, क्या सब ठीक है या तुम उदास लग रहे हो। इनसे बच्चे को अपनी भावनाएं पहचानने में मदद करते हैं। भावनाओं को दबाने के बजाय स्वीकार करना इमोशनल मजबूती की नींव रखता है।
  • क्वालिटी टाइम बिताएं- बच्चों के साथ बिताया गया समय तभी मायने रखता है, जब आपका पूरा फोकस उन पर हो। रोज थोड़ा-सा समय तय करें, जब आप सिर्फ बच्चे के साथ हों, बिना फोन, बिना काम की चिंता के। यह समय खेल, बातचीत या साथ बैठकर कुछ करने का हो सकता है। इस तरह का क्वालिटी टाइम बच्चे को यह भरोसा देता है कि वह आपकी जिंदगी में एक खास जगह रखता है।
  • अपनी भावनाएं शेयर करें- कई पेरेंट्स सोचते हैं कि अपनी कमजोरी दिखाने से उनकी इमेज कमजोर हो जाएगी, लेकिन यह सच नहीं है। जब आप अपने बच्चे को अपनी भावनाएं बताते हैं, तो उसे यह सीख मिलती है कि भावनाएं छुपाने की चीज नहीं हैं और मुश्किल समय में बात करना ठीक है।
  • परफेक्ट बनने का प्रेशर न बनाएं- हर बच्चा अलग होता है, उसकी रुचियां और क्षमताएं भी अलग होती हैं। जब माता-पिता लगातार तुलना करते हैं या परफेक्शन की उम्मीद रखते हैं, तो बच्चा भावनात्मक रूप से खुद को कमतर महसूस करने लगता है। कोशिश करें कि बच्चे को उसकी कोशिशों के लिए सराहना करें, न कि सिर्फ नतीजों के लिए। यह रवैया उसे आत्मविश्वासी और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *