भारतीय बच्चों और किशोरों में मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोग के तेजी से बढ़ते जोखिम के बीच एक अहम वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है। इस अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि स्कूल आधारित व्यावहारिक और व्यवहारिक हस्तक्षेप किशोरों में नमक और चीनी से भरपूर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (Ultra-Processed Foods-UPF) के सेवन को प्रभावी ढंग से कम कर सकते हैं।
यह अध्ययन चंडीगढ़ स्थित पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। शोध के मुताबिक, स्कूलों में लागू किए गए सरल व्यवहार परिवर्तन कार्यक्रम जंक फूड के सेवन को प्रतिदिन 1,000 कैलोरी से अधिक तक कम करने में सक्षम पाए गए हैं।
जंक फूड से जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियां
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स में फास्ट फूड, पैकेज्ड स्नैक्स और शुगरी ड्रिंक्स शामिल होते हैं। इनका अत्यधिक सेवन किशोरों और युवाओं में टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, हृदय रोग और यहां तक कि कुछ प्रकार के कैंसर के खतरे को बढ़ाने वाला एक प्रमुख कारण माना जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि किशोरावस्था में विकसित होने वाली खानपान की आदतें आगे चलकर जीवनभर के स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। ऐसे में स्कूल स्तर पर किए गए संरचित हस्तक्षेप कार्यक्रम बच्चों को सही पोषण विकल्प चुनने के लिए प्रेरित कर सकते हैं और भविष्य में होने वाली गैर-संचारी बीमारियों (Non-Communicable Diseases) के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
नीति निर्माण के लिए अहम संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल हेल्थ पॉलिसी तैयार करने में मददगार साबित हो सकता है। यदि इस तरह के कार्यक्रमों को व्यापक रूप से लागू किया जाए, तो बच्चों में बढ़ते मोटापे और लाइफस्टाइल डिजीज पर प्रभावी नियंत्रण संभव है।
