सैफई और वाराणसी जैसे क्यों नहीं चमकी रायबरेली? गांधी परिवार का रहा गढ़; मगर विकास में पीछे

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 रायबरेली

इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांदी की रायबरेली, गांधी परिवार और कांग्रेस का गढ़ रायबरेली…एक वीआईपी जिले की उपाधि। देश की सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवार की कर्मभूमि।

इतनी सारी पहचान के बावजूद प्रगति और विकास की रेस में रायबरेली कहां है? बहुत कुछ मिला, मगर यह सवाल अनुत्तरित है कि जैसे सैफई चमका, लखनऊ, वाराणसी और प्रयागराज चमके, वैसे रायबरेली क्यों नहीं? इसका राजनीतिक कद तो इन शहरों से बड़ा था।

राजनीतिक वंशबेल का पोषण करने में मगन इसे जिले को गांधी परिवार से जुड़कर वीआईपी सीट का दर्जा जरूर मिला, लेकिन विकास को जो गति मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। यहां कई बड़ी परियोजनाएं आईं, लेकिन धरातल पर नहीं उतर सकीं।

वीआईपी जिले की कनेक्टिविटी ठीक हुई, पर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभी बहुत आस है। कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा के बदले जिले को क्या मिला, इसको लेकर भी लोग एकमत नही हैं।

लालगंज के सोंडासी के महेश कुमार ने बताया कि कांग्रेस सरकार में जिले में जितना काम हुआ वह किसी सरकार में नहीं हुआ। लोग इसके बाद भी कहते हैं कि कांग्रेस ने कुछ नहीं किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने वाले निफ्ट, रेलकोच, आइडीटीआर, आइटीबीपी, रेयान इंटरनेशनल, एम्स, एनटीपीसी समेत तमाम बड़े संस्थान कांग्रेस कार्यकाल में ही स्थापित किए गए हैं।

बाजपेईपुर के अभिषेक शुक्ला कहते हैं कि कांग्रेस सरकार में जिले का जे विकास होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। लोग आज भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं। लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि एक परिवार के प्रति दशकों तक वफादारी निभाने का क्या इनाम मिला। भाजपा सरकार में सड़कें बेहतर हुई हैं, आइटीआई स्कूल खोले गए हैं। किसानों को सम्मान निधि, गरीबों को मुफ्त में राशन दिया जा रहा है।

डलमऊ के दिलीप कुमार ने बताया कि कांग्रेस सरकार में हुए काम को भाजपा देखना ही नहीं चाहती कांग्रेस ने बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए पूरे जिले में नहरों का जाल बनाया। जिसकी बदौलत किसान अच्छी खेती कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

भाजपा सरकार में बेसहारा मवेशियों के कारण किसान परेशान हैं। विनीत कुमार ने कहा कि भाजपा सरकार ने मवेशियों के संरक्षण के लिए 82 गोशालाओं का निर्माण कराया। मवेशियों को समय पर चारा पानी मिले इसके लिए सीसी कैमरे लगवाए गए हैं। भाजपा सरकार न होती तो भगवान राम का मंदिर न बन पाता।

लखनऊ-प्रयागराज के बीच बढ़ते यातायात को देखते हुए ही वर्ष 2016 में सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने संगम नगरी से रायबरेली को जोड़ने वाले रायबरेली प्रयागराज हाइवे को फोरलेन बनाने की घोषणा की थी, लेकिन जबकि एनएचएआई की सुस्ती के चलते काम को वो रफ्तार नहीं मिली, जो चाहिए थी।

रायबरेली-प्रयागराज फोरलेन किए जाने को लेकर उच्च न्यायालय ने कई बार भी संबंधित संस्थानों को जवाब तलब किया, फटकार लगाई। मगर एनएचएआई अपने ढुलमुल रवैये में सुधार नहीं कर सका। रायबरेली से प्रयागराज की दूरी 120 किमी है। केंद्र सरकार की ओर से तीन फेज के सड़क चौड़ीकरण (फोरलेन) के लिए 2636 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए।

कुल 120 किमी में 24 किमी का काम आरएंडसी कंपनी, 63 किमी का काम केपीसीएल और 8.5 किमी का काम मेसर्स पीपी पांडे के जिम्मे है। हालांकि एनएचएआई के परियोजना निदेशक आरएस यादव का कहना है कि पहले प्रोजेक्ट में 24 किमी में चार बाईपास जगतपुर, बाबूगंज, ऊंचाहार व आलापुर का निर्माण, जिसमें 60 फीसद काम पूरा हो चुका है।

दूसरे प्रोजेक्ट में 63 किमी फोरलेन का निर्माण, जिसमें मात्र 25 फीसद ही काम हो सका है। तीसरे प्रोजेक्ट में 8.50 किमी का प्रयागराज के अंदर निर्माण होना है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट की ओर से काम की मॉनिटरिंग की जा रही है। काम दिसंबर 2024 में महाकुंभ से पहले पूरा करना है।

लखनऊ और प्रयागराज के बीच के इस वीवीआईपी जिले में शिक्षा का स्तर जस का तस ही रहा। एक दो की बात छोड़ दें तो यहां उच्च शिक्षा व तकनीकि शिक्षा के लिए नए संस्थानों की स्थापना नहीं हो सकी। यही कारण है कि विद्यार्थियों को लखनऊ या प्रयागराज का रुख करना पड़ रहा है।

1984 में उच्च शिक्षा के लिए तीन महाविद्यालय थे। मगर 40 साल बाद भी परंपरागत शिक्षण संस्थान को छोड़ दिया जाए तो तकनीकि शिक्षा व प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों का काफी अभाव है।

यहां एम्स तो संचालित है, लेकिन सर्दी, जुकाम के लिए रोगी सीएचसी, पीएचसी और जिला अस्पताल का ही रुख करते हैं। रोग बढ़े, मरीज बढ़े, लेकिन जिला अस्पताल से लेकर सीएचसी व पीएचसी के स्टाफ में बढ़ोतरी नहीं हुई। लगभग चार दशक पहले जो स्थिति थी, वही आज भी बरकरार है। जिले की आबादी लगभग 34 लाख है।

एम्स को छोड़ दें और निजी अस्पतालों को शामिल कर लिया जाए तो प्रतिदिन औसतन 15000 मरीज जिले भर में स्वास्थ्य सेवाएं ले रहे है। सिर्फ सरकारी स्वास्थ्य संसाधन पर आएं तो एक डॉक्टर पर रोजाना लगभग 150 मरीज का भार है जबकि डॉक्टरों के मुताबिक एक दिन में औसत रूप से 50 मरीज की जिम्मेदारी उचित है।

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