14वे वर्ष का पड़ाव…

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महज़ 14 वर्ष की थी वो, जब उसने जीवन के एक नए पायेदान पर पर कदम रखा थाI

आँखों में हजारों सपने थे, जीवन को देखना चाहती थी, समझना चाहती थी वो और अगर मैं कहूँ की जीवन के हर एक पहलु को देखना चाहती थी तो शायद गलत नहीं होगाI

राजस्थान के छोटे से गाँव की थी “पलकी”I राजस्थान का नाम आते ही पुराने रीति रिवाज़ और कठोरता की छाया प्रति हमारे मस्तिष्क में बनने लगती हैI

ये बात सही है की राजस्थान अपनी प्राचीन रीतियों और विविधताओं के लिए जाना जाता है लेकिन इस सच को भी नाकारा नहीं जा सकता की राजस्थान में बेटियों के साथ अन्याय होता रहा हैI बेटियों को बेटे के बराबर का दर्जा नहीं दिया गया हैI और इसी मानसिकता से शुरुआत होती है पलकी जैसी बेटियों के जीवन के अन्धकार में जाने की.

 

ऐसा ही कुछ हुआ था मासूम पलकी के साथI मासूम सी थी पलकी गुड़ियों से खेलना उसका शोक हुआ करता थाI लेकिन फिर एक दिन गाँव के रघु चाचा आये उन्होंने पलकी को आंगन में खेलते देखा और एकाएक राजवीर (पलकी के पिता) से पूछ बेठे, “ क्यों राजवीर पलकी तो विवाह लायक हो चली कही बात चलायी है या फिर इसे घर में ही बिठा कर रखना इसेI”

राजवीर पलकी की और देखने लगा और थोडा रुक कर सधे हुए स्वर में बोला हाँ भैया करनी तो है बेटी को कौन घर में बिठा कर रख सकता हैI

रघु ने कहा, “और क्या बिठा कर करना भी क्या है जल्दी इसके हाथ पीले कर दे वैसे भी पराये घर की है जितनी जल्दी अपने घर पहुंचे उतना ही अच्छा हैI” ये कह कर रघु हुक्का गुड गुड़ाने लगा और राजवीर के साथ इधर उधर की बातें करने लगाI

और बस फिर क्या था शुरू हो गया पलकी के लिए वर खोजने का सिलसिला लेकिन किसी ने एक बार भी पलकी के भविष्य के बारे मई नहीं सोचा सबके लिए पलकी सिर्फ पराये घर का धन थी और अगर मैं कहूँ की सिर्फ एक ज़िम्मेदारी थी जिसे पूरा करना राजवीर अपना फ़र्ज़ समझता था तो तो शायद मैं गलत नहीं हूँI

६ माह का समय बीच में गुजरा भर था की रघु एक युवक का रिश्ता लेकर राजवीर के दरवाजे पर जा पहुंचाI  युवक के पिता पर २०० बीघे खेती थीI शहर में बढ़ी कमाई करने वाली मिठाई की दुकान थी जिसका पूरे बाज़ार मैं शायद ही कोई प्रतिद्वंद्वी होगाI और आस पास के ७ गाँव में युवक पिता “कांतिलाल” सबसे जादा रुँबिले जमींदार थे उनकी बात को कोई काट नहीं सकता थाI रघु द्वारा किये गए इस बखान से राजवीर मोहित हो गया और 14 वर्ष की पलकी का रिश्ता 25 वर्ष के मोहन के साथ तय कर दिया गयाI और देखते-देखते महीने भर में पलकी कांतिलाल के घर की बहु बन चुकी थी और इसी के साथ ख़तम हो चुकी थी पलकी की अपनी ज़िन्दगी उसके सपने उसका मन, अब इन सब पहलुओं से किसी का कोई सरोकार न थाI शादी को १ वर्ष गुज़र चुका था और इस वर्ष में पलकी एक बेटी को जन्म भी दे चुकी थीI जिस १५ वर्ष की उम्र में पलकी को पढ़ना था खेलना था जीवन में कुछ सपने पूरे करने थे वो पलकी आज एक बच्चे माँ बन चुकी थीI और उधर मोहन और पलकी के बीच का रिश्ता भी कुछ ख़ास न था और मोहन को पलकी से किसी प्रकार कोई लगाव भी न थाI मोहन शहर का पढ़ा लिखा था, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता था लेकिन पिता की बात रखने के लिए शायद उसने भी शादी के लिए हाँ के दिया थाI लेकिन मोहन को अक्सर ऐसा लगता था की पलकी उसके लायक नहीं हैI मोहन शायद अपने जैसी पढ़ी लिखी लड़की से शादी करना चाहता था लेकिन वो शायद इस बात को नहीं जानता था की लड़कियों को उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था तो फिर उसे पढ़ी लिखी दुल्हन कहा से मिल जातीI

वजा कुछ भी रही लेकिन मूल बात ये थी की मोहन पलकी को अपने काबिल नहीं मान पा रहा थाI और वहीँ पलकी थी जिसने मोहन को अपनी दुनिया बना लिया थाI पलकी ने अपनों सपनो का तो गला ही घोंट दिया था शायद अब उसने अपना सब कुछ मोहन को ही मान लिया था और होता भी यही है क्योंकि ये शुरुआत से ही हमारे देश में लड़कियों को ये यही सिखाया जाता की शादी के बाद पति से ही उनका सम्मान है और उसी के नाम से उनको जाना जाता हैI और पलकी ने इस बात को स्वीकार कर लिया थाI लेकिन पलकी उस समय अन्दर ही अन्दर बहुत घुटती थी जब मोहन उसे जाहिल गावर और अनपढ़ कह कर बुलाता था और ये अक्सर होता था जब मोहन गुस्से में होता थाI पलकी को ये बातें अक्सर ससुराली जनों से सुनने की मिलती थी लेकिन जब वो ये सब मोहन की जुबान से सुनती तो भीतर से टूट जाती और घर के एक कोने में सिसकती सिसकती सोचती की काश उसे भी पढने का मोका मिला होता लेकिन उसे क्या पता था की उसका सारा जीवन एक विकृत मानसिकता के कारण बर्बाद हो चुका थाI

पलकी आज भी अपने जीवन में जब पीछे देखती है तो 14 वर्ष की पलकी को गुडिया के साथ खेलता पाती है और अपने जीवन के उन चंद खुशहाल पलों को याद करके थोडा मुस्कुरा लेती है, लेकिन आज भी पलकी की उस मुस्कान में एक ही सवाल है, “ उसकी क्या गलती थी ?”

 

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