एक मजबूरी के कारण पहली बार जनता के लिए खोले गए थे बकिंघम पैलेस के दरवाजे, दिलचस्प है ये इनसाइड स्टोरी

लंदन का बकिंघम पैलेस आज न केवल ब्रिटेन की शान है, बल्कि दुनिया भर के पर्यटकों के लिए एक बड़ा आकर्षण भी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस भव्य महल के दरवाजे आम जनता के लिए किसी खुशी के मौके पर नहीं, बल्कि एक भारी नुकसान की भरपाई के लिए खोले गए थे?

जी हां, आर्थिक मजबूरी की वजह से बकिंघम पैलेस के दरवाजों को आम जनता के लिए खोला गया था। आइए जानें आखिर क्या थी वह मजबूरी।

विंडसर कैसल की आग और भारी नुकसान

इस कहानी की शुरुआत होती है नवंबर 1992 से, जब शाही परिवार के एक और मशहूर निवास, विंडसर कैसल में भीषण आग लग गई थी। इस तबाही ने महल के 100 से भी ज्यादा कमरों को मलबे में तब्दील कर दिया। जब नुकसान का आकलन किया गया, तो इसकी मरम्मत का खर्च करीब 37 मिलियन पाउंड तक जा पहुंचा।

उस समय एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। जनता का मानना था कि शाही महल की मरम्मत का भारी-भरकम बोझ टैक्स भरने वाले आम नागरिकों पर नहीं डालना चाहिए। इसी दबाव और मरम्मत के लिए फंड जुटाने की जरूरत के चलते एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया।

पहली बार खुले शाही दरवाजे

जनता के विरोध और आर्थिक जरूरत को देखते हुए, 29 अप्रैल 1993 को पहली बार बकिंघम पैलेस के स्टेट रूम्स को आम जनता के लिए खोलने का ऐलान किया गया। उस समय महल के अंदर जाने के लिए 8 पाउंड का टिकट रखा गया था। इस टिकट खिड़की से होने वाली कमाई का इस्तेमाल विंडसर कैसल की मरम्मत के लिए किया गया। इस तरह, एक आपदा ने आम लोगों को राजा-महाराजाओं की आलीशान दुनिया को करीब से देखने का मौका दे दिया।

कैसे बना बकिंघम पैलेस शाही महल?

बकिंघम पैलेस का इतिहास भी कम रोचक नहीं है। इसकी नींव 1703 में पड़ी थी, जब एक स्थानीय अधिकारी जॉन शेफील्ड ने इसे अपने निजी रहने के लिए बकिंघम हाउस के नाम से बनवाया था।

बाद में, साल 1761 में किंग जॉर्ज तृतीय ने इसे खरीद लिया। समय बीतने के साथ, साधारण सा दिखने वाला यह घर एक भव्य महल में बदलता गया। आखिर में, 1837 में जब महारानी विक्टोरिया ने सत्ता संभाली, तब इसे आधिकारिक तौर पर शाही निवास घोषित किया गया।

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