सरकार युवा को शिक्षित बनाना चाहती या भक्त ?

देश का भविष्य… देश का युवा।

लेकिन आज सवाल यह है कि देश का यही युवा आखिर किस दिशा में जा रहा है?

एक तरफ़ सावन आते ही बड़ी संख्या में युवा कांवड़ यात्रा के लिए निकलते हैं। कई किलोमीटर पैदल चलते हैं, गंगाजल लेकर आते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

यह उनकी धार्मिक आस्था है।

लेकिन सवाल यहां आस्था के खिलाफ़ नहीं है।

सवाल है—क्या आज के भारत में युवा की प्राथमिकता शिक्षा, रोजगार, विज्ञान और अपने अधिकार होने चाहिए या धार्मिक गतिविधियां?

क्योंकि किसी भी देश की असली ताकत उसकी युवा आबादी की संख्या नहीं होती।

उसकी असली ताकत होती है—उसकी शिक्षा, उसकी वैज्ञानिक सोच, उसकी उत्पादकता और उसकी सवाल पूछने की क्षमता।

और यहीं पर सरकार के रवैये को लेकर सवाल खड़ा होता है।

जब कांवड़ यात्रा निकलती है तो प्रशासन पूरी सक्रियता के साथ व्यवस्थाएं करता है। कई जगह कांवड़ियों का स्वागत किया जाता है और पुष्पवर्षा भी होती है।

लेकिन जब छात्र अपने अधिकारों, शिक्षा, रोजगार या परीक्षा व्यवस्था से जुड़े सवाल लेकर राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन करते हैं, तो तस्वीर बदलती हुई दिखाई देती है।

प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई और लाठीचार्ज की घटनाएं सामने आती हैं और कई छात्र घायल होते हैं।

तो सवाल सीधा है—

क्या सरकार धार्मिक गतिविधियों में शामिल युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए जितनी तत्पर दिखाई देती है, उतनी ही तत्परता छात्रों की समस्याएं सुनने में भी दिखाती है?

अगर किसी युवा के हाथ में कांवड़ है तो उसका स्वागत…

लेकिन अगर उसी युवा के हाथ में अपनी मांगों का पोस्टर है तो लाठी?

अगर युवा धार्मिक यात्रा के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चल सकता है, तो क्या वह अपने भविष्य के लिए सवाल भी नहीं पूछ सकता?

यही वह जगह है जहां सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना जरूरी है।

क्योंकि देश की प्रगति सिर्फ़ धार्मिक आयोजनों से नहीं होती।

देश आगे बढ़ता है स्कूलों से, विश्वविद्यालयों से, प्रयोगशालाओं से, अस्पतालों से, उद्योगों से, रोजगार से और वैज्ञानिक सोच से।

दुनिया के विकसित देशों को देखिए।

उन्होंने अपने युवाओं को शिक्षा, तकनीक, रिसर्च और innovation से जोड़ा। उन्होंने विश्वविद्यालयों और research institutions में निवेश किया। उन्होंने युवाओं को सवाल पूछने और नई चीजें बनाने का अवसर दिया।

क्योंकि कोई भी देश सिर्फ़ अपनी धार्मिक भावनाओं से आर्थिक और वैज्ञानिक महाशक्ति नहीं बनता।

आस्था व्यक्तिगत हो सकती है, लेकिन देश का विकास सार्वजनिक नीतियों, शिक्षा, विज्ञान और संस्थानों से होता है।

और इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि युवा मंदिर जा रहा है या नहीं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि—

क्या युवा पढ़ रहा है?

क्या उसके पास रोजगार है?

क्या उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है?

क्या वह अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा सकता है?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या सरकार उसकी आवाज़ सुन रही है?

क्योंकि अगर किसी देश का युवा अपने भविष्य के सवाल छोड़कर केवल भावनात्मक मुद्दों में उलझ जाए, तो यह उस युवा का नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का नुकसान है।

धर्म व्यक्ति की निजी आस्था का विषय हो सकता है।

लेकिन शिक्षा और रोजगार देश के भविष्य का सवाल हैं।

इसलिए सरकार से सवाल होना चाहिए कि वह युवाओं को किस दिशा में ले जाना चाहती है?

ऐसे युवा की तरफ़, जो सवाल पूछे, पढ़े, रिसर्च करे, नौकरी मांगे, नई technology बनाए और देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करे?

या फिर ऐसे युवा की तरफ़, जिसे सिर्फ़ भावनात्मक मुद्दों में व्यस्त रखा जाए?

क्योंकि इतिहास हमें यही बताता है कि जिन समाजों ने ज्ञान, शिक्षा और वैज्ञानिक सोच को पीछे छोड़ दिया, वे लंबे समय तक प्रगति की दौड़ में आगे नहीं रह पाए।

आज भारत के सामने दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का लक्ष्य है।

लेकिन यह लक्ष्य सिर्फ़ नारों से हासिल नहीं होगा।

इसके लिए चाहिए—शिक्षित युवा, वैज्ञानिक सोच, बेहतर विश्वविद्यालय, रोजगार और सवाल पूछने की आज़ादी।

इसलिए कांवड़ यात्रा पर सवाल नहीं…

सवाल है सरकार की प्राथमिकताओं पर।

सवाल यह है कि अगर सरकार युवा की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करती है, तो क्या वह उसके भविष्य की चिंताओं का भी उतना ही सम्मान करेगी?

क्योंकि देश को सिर्फ़ भावनाओं से नहीं…

ज्ञान से आगे बढ़ना है।

और अगर आज का युवा अपने भविष्य के लिए सवाल पूछ रहा है, तो सरकार का काम उसकी आवाज़ दबाना नहीं…

उस आवाज़ को सुनना होना चाहिए।

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