Maidaan के बाद प्रियामणि ने ‘द फैमिली मैन 3’ के लिए कसी कमर, मनोज बाजपेयी संग शूटिंग को लेकर दी ये अपडेट

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मुंबई

दक्षिण भारतीय फिल्मों की अभिनेत्री प्रियामणि हिंदी फिल्मों में अपने लिए अच्छे काम तलाश रही हैं। पिछले दिनों उनकी फिल्म आर्टिकल 370 रिलीज हुई थी। अब मैदान प्रदर्शित हुई है। प्रियामणि से उनकी इन फिल्मों की पसंद, हिंदी सिनेमा में काम करने के अनुभव, द फैमिली मैन 3 वेब सीरीज को लेकर बातचीत के अंश…..

मुझे हिंदी में जो काम मिल रहा है, उससे मैं काफी खुश हूं। मुझे पहचान मिल रही है। जहां तक हिंदी की बात है, तो बात कर करके मेरी हिंदी अच्छी हो गई है। स्कूल में मेरी वैकल्पिक भाषा हिंदी ही थी। मैं आसानी से हिंदी पढ़-लिख सकती हूं। मुझे लगता है। कि साउथ के ज्यादातर कलाकारों को हिंदी में बात करना आता है। उच्चारण में थोड़ा बहुत साउथ का टच हो सकता है।

खेल से करीबी रिश्ता रहा है। मैं जिला स्तरीय बैडमिंटन खिलाड़ी रही हूं। मेरी मां देश के लिए बैडमिंटन खेल चुकी हैं। मेरे पिता ने भी क्रिकेट खेला है । इस फिल्म का ऑफर मेरे पति (फिल्म निर्माता मुस्तफा राज) के पास आया था। मेरे पति और इस फिल्म के निर्माता बोनी (कपूर) सर ने साथ काम किया है। उनकी आपसे में बातें होती रहती हैं। उन्होंने पूछा कि तुम्हारी बीवी मेरी फिल्म करेंगी? मेरे पति ने हां कहा। फिर मैंने कहानी सुनी, लुक टेस्ट हुआ और एक हफ्ते में मैंने शूटिंग शुरू कर दी।

तीसरे सीजन की शूटिंग बहुत जल्द शुरू होने वाली है। कुछ नया देखने को मिलेगा। यह बात सच है कि मेरे लिए यह शो अहम है, क्योंकि चेन्नई एक्सप्रेस फिल्म के बाद हिंदी दर्शकों के सामने मुझे यही शो लेकर आया था। फिल्म से वह मेरे बारे में जानने लगे थे, लेकिन इस शो के बाद उन्होंने मेरा पुराना काम देखना भी शुरू किया। मुझे दूसरा मौका दिया। यह शो मैंने शादी के तुरंत बाद किया था। उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा । मनोज (बाजपेयी) सर के साथ बहुत अच्छी बॉन्डिंग हो गई है। हम दोस्त बन गए हैं। उनसे तीसरे सीजन के सेट पर मिलने का इंतजार है।

मुझे ऐसा नहीं लगता है। उस फिल्म को बनाने का इरादा सही था। कश्मीर से आर्टिकल 370 के हटने के बाद वहां का सकारात्मक बदलाव आए हैं, वह दिखाना जरूरी था। कम लोग इसकी अहमियत जानते थे। आर्टिकल 370 के हटने से कश्मीर के लोग खुश हैं। वहां पर्यटन बढ़ा है। सिनेमाघर खुल रहे हैं। माननीय प्रधानमंत्री ने इस मिशन को बड़े ही गोपनीय तरीके से अंजाम दिया था, जो सराहनीय है।

मुझे ऐसा नहीं लगता है। हिंदी के कई कलाकार हैं, जैसे सोनू सूद, संजय दत्त जो साउथ में काम कर रहे हैं। एक वजह यह हो सकती है कि साउथ में बहुत से सुपरस्टार हैं। उनका अपना मार्केट है, दर्शक हैं। इंडस्ट्री और उसकी भाषा को एक किनारे रखकर, कलाकार को केवल उसकी योग्यता के आधार पर सम्मान मिलना चाहिए।

बहुत बदला है । जब मैं नई-नई साल 2002 में आई थी, तब रील्स पर फिल्में शूट हुआ करती थी। फिल्म को सीमित रील्स में खत्म करना होता था। अब तो सब डिजिटल है । जीवन आसान हो गया है। पहले दो-तीन टेक कर लो तो निर्माता-निर्देशक ही कहने लगते थे कि टेक मत करो रील्स खत्म हो रही है। अब 10-15 टेक कर लो, कोई फर्क नहीं पड़ता, तब तक करते रहो जब तक शॉट परफेक्ट न हो जाए। हर दौर के कुछ फायदे – नुकसान दोनों रहे हैं।

एयरपोर्ट जाने के लिए मेकअप करना, पपराजियों के सामने पोज करना मुझसे नहीं होता। मैं चाहती हूं कि अपीयरेंस की बजाय मेरा काम बोले ।

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