पवन उड़ावे बतिया…रील्स पर खूब सुना होगा यह गाना, लेकिन क्या आप जानते हैं सलमान खान के इस गीत की कहानी

पवन उड़ावे बतिया ओ बतिया…ये गाना पिछले कुछ समय से रील्स पर काफी वायरल है। हम में से कई लोगों ने इस गाने पर दूसरों को रील्स बनाते देखा होगा और शायद खुद भी इस गाने पर रील जरूर बनाई होगी। यह गाना असल में साल 2010 में आई सलमान खान की फिल्म ‘वीर’ के लिए बनाया गया था, लेकिन यह कोई आम गाना नहीं है।

यह गाना असल में एक ठुमरी है, जिसे फिल्म के लिए बनाया गया था। साजिद-वाजिद का संगीत, गुलजार साहब के जादुई शब्द और रेखा भारद्वाज की खनकती आवाज ने इस पुरानी क्लासिकल शैली ‘ठुमरी’ को आज के युवाओं के बीच फिर से जिंदा कर दिया है। आइए आज इस आर्टिकल में हम आपको बताते हैं गाने की इसी शैली ठुमरी के बारे में विस्तार से –

आखिर ‘ठुमरी’ है क्या?

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ‘ठुमरी’ को एक सेमी-क्लासिकल शैली माना जाता है। यह कोई गंभीर या बहुत सारे कड़े नियमों वाला संगीत नहीं है, बल्कि प्यार, विरह, रोमांस और श्रृंगार रस में डूबा हुआ एक बेहद मीठा संगीत है। यह मुख्य रूप से ब्रज भाषा और अवधी जैसी देसी बोलियों में गाया जाता है।

‘ठुमरी’ शब्द असल ‘ठुमकना’ शब्द से बना है, जिसका मतलब बहुत ही नजाकत और लय के साथ चलना होता है। यह शब्द बताता है कि यह सिर्फ गाने की कला नहीं, बल्कि नृत्य से भी गहराई से जुड़ी है।

नवाबों के दरबार से निकला ठुमरी

आम तौर पर लोग मानते हैं कि ठुमरी की शुरुआत 19वीं सदी में लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के शाही दरबार में हुई थी, लेकिन संगीत के इतिहासकारों की माने तो इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं। इसके कुछ अंश तो भरत मुनि के प्राचीन ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में भी मिलते हैं। 18वीं और 19वीं सदी के दौर में जब यह शाही दरबारों तक पहुंची, तो इसके दो खास रूप सामने आए:

बंदिश-की-ठुमरी: यह थोड़ी तेज रफ्तार वाली होती थी और खास तौर पर कथक डांसरों के नाचने के लिए बनाई गई थी।

बोल-बनाव-की-ठुमरी: यह बहुत धीमी, सुरीली और भावुक होती थी, जिसमें गायक शब्दों के अर्थ और उसकी गहरी भावना (पुकार) पर सबसे ज्यादा जोर देते थे।

दरबारों से लेकर सोशल मीडिया तक का सफर

शुरुआती दौर में इस खूबसूरत कला को निखारने और सहेजने का बहुत बड़ा काम कला-प्रेमी महिलाओं ने किया। जब शाही दरबारों का दौर खत्म होने लगा, तब रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी और बाद में महान विदुषी गिरिजा देवी जैसी दिग्गज गायिकाओं ने ठुमरी को निजी महफिलों की दीवारों से निकालकर बड़े और खुले मंचों तक पहुंचाया।

आज जब हम “पवन उड़ावे बतियां” जैसी ठुमरी को इंस्टाग्राम रील्स पर बजते हुए सुनते हैं, तो मन अपने आप भी इसके बोलों और संगीत के साथ थिरकने लगता है। यह साबित करता है, कि दौर चाहे जो भी हो, ठुमरी की थिरक आज भी लोगों के दिलों में उसी तरह से राज करती है।

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